बुधवार, 6 मार्च 2013

गणेश जी ने दूध पीया !.. "ज़िया -उल-हक़" शहीद हो गए !


शीर्षक देख कर आप चौक गए ना ?  लेकिन यकीन जानिए की गणेश जी के दुग्धपान करने और डी एस पी "जिया उल हक़ " की शहादत वाली घटना में अद्भुत समानता है .
हुआ यूँ की आज से लगभग 20 साल पहले अमेरिकी साम्राज्यवादियो ने एक एक्सपेरिमेंट करा था , उस एक्सपेरिमेंट का उद्देश्य ये जानना था की भारत की जनता अंधविश्वास के कितने गहरे गर्त में डूबी हुई है , और ये इसलिए किया गया की उन्ही दिनों भारत साम्राज्यवादियो द्वारा चलाये गए अभियान के तहत आर्थिक उदारीकरण और मुक्त बाजार व्यवस्था  के लिए हमारे देश को लूटने के लिए विदेशियों को आमंत्रित करना शुरू कर चूका था ! जैसा की ये सर्वविदित है की किसी भी देश में जब पूँजी की लूट शुरू होती है तो उसके खिलाफ संघर्ष भी शुरू हो जाता है, इसलिए उसी संघर्ष को दबाने के लिए जनता को जात पात धरम के नाम पर तो बांटा ही जाता है लेकिन साथ साथ ये भी जानना जरूरी होता है की उस देश विशेष के लोगो का बुद्धि का स्तर कितना है,,,क्या वो लोग हमारी लूट को समझ पायेंगे , या फिर उस लूट को किसी तरह हम इन दुर्बुद्धि लोगो को जायज ठहरा पायेंगे ?इसी साजिश के तहत 21 सितम्बर 1995 को अमेरिका के एक इन्टरनेशनल  मंदिर इस्कोन से एक अफवाह उडाई गयी की "भारत का एक भगवान् आज सुबह से दूध पी रहा है " और इस खबर को किसी तरह भारत में पंहुचा दिया गया . सबसे पहले दिल्ली के एक मंदिर में इस खबर पर मोहर लगाई की हांजी आज भगवान् दूध पि रहे है ,बस फिर क्या था चाँद ही मिनटों में ये खबर भारत के कोने कोने फ़ैल गयी और लोग अंधे होकर हाथो में दूध का लोटा लेकर मंदिरों में इकठ्ठा होना शुरू हो गए .भगवान् ने दूध पिया या नहीं पिया या क्यों पीया ये सब तो अलग बहस की बाते है , लेकिन हां ये प्रयोग की सफलता देख कर साम्राज्यवादी शक्तियों की बांछे खिल गयी . उनके लिए तो ये ऐसा ही था जैसे की कोई चोर किसी घर में चोरी करने के लिए घुसा और उसने देखा की घर के सभी लॊग अफ़ीम खाकर टुन्न बेसुध हुए पड़े है ...और चोर ने बड़े आराम से घर में लूट मचाई और चलता बना।
इस घटना के बाद पूँजी की लूट के माठाधीषों को ये समझ में आ गया की दुनिया की सबसे बड़ी मंडी बनाने जा रहा भारत के लोग पहले से ही अफीम के नशे में डूबे हुए है, और इन्हें लूटने में कोई परेशानी नहीं आने वाली .

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कट ------  कट ------ कट ...... सीन चेंज..............
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जगह - उत्तर प्रदेश
तहसील- कुंडा , गाँव- वलीपुर
घटना - पुलिस डी एस पी "जिया-उल-हक़ " की कुछ लोगो ने ह्त्या कर दी
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इस दुर्घटना का बैक ग्राउण्ड आपको मालूम ही है ,तो मैं सीधे इस घटना के बाद के माहौल पर कुछ रौशनी डालता हूँ। ये घटना और इससे जुडी कुछ बाते बड़ी पेंचीदा थी,,,,,,,जैसे की "मरहूम जिया-उल-हक़ एक मुसलमान थे, ह्त्या करने वाले और उनके आका लोग राजपूत थे , घटना के मुख्य आरोपी के खैरख्वाह राजा भैय्या राज्य सरकार में मंत्री थे , राज्य सरकार जो कुछ ही महीने पहले चुन कर आई है उनकी जीत में मुस्लिम समुदाय का बड़ा योगदान था, सरकार के विपक्ष में एक दल बीजेपी है जो की मुस्लिम विरोधी माना जाता है ,....वगैहरा .. वगैहरा . जिया-उल-हक़ की शहादत के बाद अगले दो दिन तक तो सभी लोग दिमाग और संयम की हद में रहे लेकिन तीसरे दिन के बाद से सब लोग तहजीब के दायरे से बाहर निकल कर कबड्डी खेलना शुरू कर दिए और गाहे बगाहे फिर से शोषण कारी शक्तियों को ये सन्देश दे डाला की हम लोग सुधरने वाले नहीं है और सारी  जिन्दगी आपस में लड़ते रहेंगे. ये कैसे हुआ ..आइये देखते है .


इस घटना के बाद सबसे पहले सभी लोग एकमत से ये मान कर चल रहे थे की ये घटना एक दबंग की गुंडई का परिणाम है जिसमे एक इमानदार ओफ्फिसर को अपनी जान गवानी पड़ी .और खुद सपा के समर्थक भी राज्य प्रशाशन  की इस ढील पर नाराज होते दिखे . कुछ बीजेपी और हिन्दूवादी देशभक्त लोग बुझे मन से इस घटना की निंदा तो करते रहे लेकिन मरने वाला एक मुसलमान था इसलिए एक दो कमेन्ट डाल कर जल्दी से इतिश्री कर डाली. और मुस्लिम समुदाय के लोग अपनी बेचारगी पर अफ़सोस जताते हुए दिखे . और वो दिल्ली में दामिनी की ह्त्या के बाद हुए प्रतिरोध जताने के लिए बाकी देशवासियों की तरफ हसरत भरी निगाहों से देखते रहे . लेकिन असली कहानी शुरू हुई तीन दिन बाद, जब सब लोग हमाम में नंगे होने शुरू हो गए.  # सबसे पहले सपा और मुलायम सिंह समर्थक लोग इस घटना से घबराने लगे की कही जिया की ह्त्या से सपा का मुस्लिम वोट बैंक न खिसक जाए , क्योंकि पिछले चुनावों में मायावती की हार का मुख्य कारण येही था की उसके मुस्लिम वोटो का ध्रुवीकरण मुलायम जी की तरफ हो गया था, ठीक वैसे ही जैसे 2007 में मायावती ने मुलायम को इसी मुस्लिम धुर्विकरण के तहत पराजित किया था। क्योंकि मायावती का दलित वोट कभी भी उनके आलावा कंही और वोट नहीं देता और उनकी जीत को सुनिश्चित करने वाले मुस्लिम वोट ही होते है .

लेकिन मुस्लिम भाइयो के बार बार विरोध के कारण घबराहट के तहत सपा समर्थक मर्यादा में तो रहे लेकिन अंततः उनका सब्र का बाँध टूटा और वो खुल कर पार्टी के बचाव में आकर सीधे सीधे आक्रामक होकर कहने लगे. " रजा भैय्या को निष्काषित कर दिया है , जिया के घर वालो को 50 लाख और नौकरी दे दी गयी है , और सीबीआई की जांच होगी,,,,और आपको क्या चाहिए ????"

# दूसरी जमात में वो लोग आते है जिन्हें इस घटना के "राजपूत" प्रेम जाग उठा और वो राजा भैया के राजपूत होने की वजह से खुलकर उसका साथ देने लगे .
इन साथियो ने सही गलत को समझने की कोशिश करे बिना ही रजा भैय्या को शेर बता कर खुल्ले आम उनका साथ दिया, ये प्रेम शायद इसलिए भी है की जातिगत कम्पेटिबिलिटी और दबंगई की वजह से रघुराज प्रताप सिंह बीजेपी में एंट्री पाने के लिए परफेक्ट है . उन्हें सपा छोड़ने तक की सलाह दे डाली , कुछ ने कहा की सपा तो आज है , कल नहीं रहेगी लेकिन राजा भैय्या का जलवा तो कल भी था और आने वाले कल में भी रहेगा .इनके तर्क के अनुसार जिस किसी ने "राजा" पर उंगली उठायी ये उसे न्याय पालिका की दुहाई देकर उसे जज ना बने की सलाह देने लगे , कुछ भाई तो यहाँ पर भी नहीं रुके और धमकी भरे अंदाज में लोगो को ऐसे हड़काना शुरू कर दिया की जैसे वो राजा के साथ रहने वाले लठैत हो , और धमकी भी ऐसी  "की बेटे घर से उठा लिए जाओगे" ...भले ही उन्होंने आज तक  " राजा " को देखा भी ना हो . मतलब उन्होंने अपनी पूरी राजपुताना शूरवीरता यहाँ पर दिखा दी।

# तीसरी जमात में इस मुल्क के सबसे बड़े देशभक्त आरएसएस और हिन्दू ह्रदय सम्राट श्री नरेन्द्र मोदी के भक्त लोग आते है , जिन्होंने सीधे सीधे इस घटना को हिन्दू मुस्लिम से जोड़ मारा , "जिया"  की ह्त्या की वजह या इस अराजकता पर सवाल उठाने की बजाय वो ये सिध्ह करने में लग गए की , मरने वाला एक मुसलमान था , मुसलमान था ,मुसलमान था.उनके महान तर्क कुछ इस प्रकार थे.  "जब कुम्भ मेले में लोग मरे तो इतना बवाल क्यों नहीं हुआ "

"बाटला हाउस में शर्मा जी शहीद हुए तो उनके लिए इतना हल्ला क्यों नहीं हुआ "
"ये मुसलमान था इसलिए इसे इतना भाव क्यों दिया जा रहा है ,,,,बांग्लादेश में हिन्दुओ की ह्त्या पर लोग क्यों नहीं बोल रहे है ..""
और एक देशभक्त हिन्दू ने तो यहाँ तक कह डाला ..."ठीक हुआ यार एक और मुल्ला कम हुआ इस धरती से"

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खैर "जिया-उल-हक़ " शहीद हो चुके है , पुलिस में प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है और सियासत में हर राजनितिक दल इस घटना से अपने अपने फायदे को देख कर टिपण्णी दे रहे है।
लेकिन जो बात दीगर की है वो ये है की पूंजीवादी लुटेरो , उनके एजेंट राजनितिक दलों और पूंजीवादी शोषण को सही ठहराने वाले बुद्धिजीवी कलम घसीटो को ये घटना एक बहुत बड़े प्रयोग के तौर पर दिखी .प्रयोग ये की आप भारतीय समाज में जनता के बीच कोई भी ऐसी घटना करवा दीजिये, और फिर जनता उस घटना में से धर्मं ,जात, राजनितिक रुझान, क्षेत्रवाद जैसे मुद्दे  खुद-ब़ा -खुद ढूंढ़ कर आपस में ही जूतम पैजार शुरू कर देगी . लगभग ऐसे ही जैसे की दो अफीम के नशे में धुत्त इंसान सड़क पर आपस में लड़ते है और नशा उतर जाने के बाद फिर एक एक अफीम की गोली खाकर अपनी लड़ाई दोबारा चालू कर देते है। और इस बीच एक अफीम बेचने वाला पहले उन्हें ये नशा करवाता है और उनकी लड़ाई के दौरान उनके घर में घुस कर लूट पाट करके कल्टी हो लेता है .
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गणेश जी को पिलाया दूध आज भी नालियों में बह रहा है और जिया उल हक़ अपनी शहादत के 5 दिन बाद भी अपने मुल्क की जनता का ये हाल देख कर दुखी है। और जनता हमेशा की तरह एकजुट होकर व्यवस्था से लड़ने की बजाय जात, पात धर्मं , राजनैतिक दल, क्षेत्रवाद के पल्लू से चिपकी आपस में लड़ रही है. ठीक इसी समय पूंजीपति और उनके चाकर राजनैतिक दल इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को एक प्रयोग मान कर जश्न मना रहे है ! वैसे ही जैसे 1995 में गणेश जी के दूध वाले एक्सपेरिमेंट की सफलता के बाद मनाया था .इस स्वतः निर्मित प्रयोग की घटनाए अभी भी मुकरर्र है और आने वाले दिनों में इसके नए नए आयाम देखने को मिलेंगे

 बहरहाल ..
जात, पात ,धरम, क्षेत्र , अंधभक्ति और किसी भी स्वार्थ से परे  दिन रात शोषण  में पिसती भारत की मेहनतकश जनता की ओर से अपने भाई अपने दोस्त "ज़िया -उल-हक़ " को अश्रु  पूर्ण श्रधांजली।

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सोमवार, 4 मार्च 2013

नक्सलवाद - समस्या और विश्लेषण

नोट - ये लेख सिर्फ एक समस्या को समझने का प्रयास मात्र है, सिर्फ समस्या का विश्लेषण है , इसे समझने के लिए आपका विवेक जरुरी है !
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पिछले दिनों  Facebook  !!
पोल खोल!! " बोल .. की लब आज़ाद है तेरे " ग्रुप में नक्सलवाद पर काफी कुछ डिस्कस हुआ, कई दोस्तों ने इसके बारे में नेट से जानकारिय छाप छाप कर यहाँ पर पेस्ट करी .और अपने अपने विचार रखे ! अमूमन होता यही है , हम सभी लोग किसी भी बात पर बहुत जल्द यकीन कर लेते है, खासकरके जब वो हमारे पक्ष में या हमरी विचारधारा के हित में की गयी हो .
फिलहाल बात यहाँ की हो रही है नक्सलवाद की , तो इसे समझने के लिए हमें पहले सतही बातो से उठकर कुछ गहराई से सोचना पड़ेगा की ये समस्या क्या है .
इस बात की जड़ छुपी है शब्द "स्वतन्त्रता " में . इस शब्द को अगर हम ध्यान से देखे तो ये दो शब्दों से मिल कर बना है। "स्व और तंत्र " यानी की स्वयं के द्वारा बनाया गया तंत्र या अंग्रेजी में कहे तो सेल्फ मेड सिस्टम . तो आज भारत में प्रमुखतः दो प्रकार के लोग बसते है , एक वो जो भारत को 1947 से एक स्वतंत्र मुल्क मानते है , और दुसरे वो लोग जो ये मानते है की 1947 की घटना एक "स्वतंत्रता "नहीं बल्कि सिर्फ राजनितिक शक्ति का हस्तांतरण था.
स्वतंत्रता शब्द की कसौटी पर अगर हम देखे तो हमारा भारत देश किसी भी द्रष्टि से स्वतंत्र नजर नहीं आता, यहाँ का बजट , यहाँ की सेना , पुलिस और साड़ी नौकरशाही सिर्फ और सिर्फ एक विशेष वर्ग के हितो के लिए काम करती है , ना की आम जनता के लिए,और सिर्फ कहने के लिए जनता को वोट देने का अधिकार, संगठन बनाने और भाषण देने का अधिकार दिया हुआ है जिसे डेमोक्रेसी के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन ये भी सिर्फ तब तक ही प्रयोग में रहता है की जब तक आप इस सिस्टम के लिए खतरा नहीं बन जाते, जैसे ही आप इस व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होते है या सवाल करना शुरू कर देते है तो आपको "सिस्टम के लिए खतरा और यहाँ तक की आतंकवादी या देशद्रोही भी घोषित किया जा सकता है।
कहीं ये लोग वोही तो नहीं जो इस सिस्टम के मुह्ह पर बोलते है की ये मुल्क स्वतंत्र नहीं बल्कि परतंत्र है ..............चलिए शायद लेख के अंत तक ये निष्कर्ष निकल ही जाए।।।देखते है।
जैसा की मैंने कहा की कुछ लोगो मानते है की हमारा भारत देश किसी भी द्रष्टि से स्वतंत्र नजर नहीं है , उनके हिसाब से यहाँ का बजट , यहाँ की सेना , पुलिस और सारी नौकरशाही सिर्फ और सिर्फ एक विशेष वर्ग के हितो के लिए काम करती है, तो आखिर ये कौन सा वर्ग है जिसके लिए साड़ी सेना , नौकरशाही , पोलिस और सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्षी पार्टिया काम करती है , और क्यों करती है . और क्या कारण है की वो इस व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है .
इन लोगो के हिसाब से 1947 में स्वतंत्रता नहीं बल्कि सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ था, जिसमे अँगरेज़ साम्राज्यवादी अपनी स्टेट भारत को दो टुकडो में बाँट कर अपने लिए काम करने वाले को सौप कर चले गए थे, लेकिन आर्थिक , राजीतिक और उत्पादन व्यवस्था में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ था। अंग्रेजो का यहाँ आना और यहाँ पर अपना राज कायम करने का प्रथम उद्देश्य हमें गुलाम बनाना नहीं बल्कि यहाँ के संसाधनों और सस्ते श्रम की लूट था, जिसके लिया यहाँ की जनता अगर आराम से तैयार हो जाती तो बल प्रयोग की कोई जरुरत नहीं थी और अगर नहीं होती तो वो लोग डंडे से शाशन करने को भी तैयार और अभ्यस्त थे, भारत में उन्हे जब जिसकी जरुरत हुई उन्होने वो तरीका इस्तेमाल किया
तो उस समय भारत में इस व्यवस्था का विरोध करने के लिए दोनों प्रकार के संघर्ष चल रहे थे, एक तरफ वो लोग थे जो इस देश को किसी भी दुसरे के बनाए तंत्र (सिस्टम) से मुक्त करके इसे सच्ची स्वतंत्रता दिलाना चाहते थे, और एक तरफ वो लोग थे जो बिना किसी आर्थिक और उत्पादन व्यवस्था के मालिको को बदले बिना की सिर्फ सत्ता पर कब्जा चाहते थे अंग्रेजो के साथ सहयोग करते हुए . और अंत में 1947 में क्या हुआ ये सबको पता है।
खैर अंग्रेज तो चले गए परन्तु उनका बनाया सिस्टम (उत्पादन व्यवस्था और राजनितिक तंत्र) ज्यो का त्यों बरकरार रहा।और हमारे राजनितिक दल उसके प्रति वफादारी से काम करते रहे 15 अगस्त का साल दर साल जश्न मनाते हुए .
लेकिन इन सबके वावजूद वो क्रांतिकारी वर्ग अब भी ज़िंदा था जो की संघर्ष चलाये रखना चाहता था और सच्ची स्वंत्रता के सपने देखा करता था। इस प्रकार की समझ रखने वाले लोग सबसे ज्यादा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में थे , जिन्होंने अपने निचले कार्यकर्ताओं को ये समझाया की " कोई बात नहीं अब हम भारत में बने हुए इसी संसदीय रस्ते से चलकर सत्ता में पहुच कर अपना स्वयम का तंत्र बनायेंगे और जनता को सच्ची आजादी का सुख देंगे, लेकिन 60 के दशक के अंत तक पार्टी के काम काज और प्रक्टिस को देख कर कई कार्यकर्ताओं के मन में ये शक पैदा होने लगा की ये पार्टी वोही सारे हथकंडे अपना रही है जो की बाकी सभी पार्टिया अपना रही थी जैसे की पूंजीपतियों से पैसे लेकर चुनाव लड़ना और उनके हितो के लिए काम करना , आदि आदि।
इस प्रक्टिस के विरुद्ध कुछ लोगो ने आवाज उठायी और पार्टी से सवाल किया की इस प्रकार आप पूंजीपतियों और शोषणकारी ताकतों के बनाए संसदीय मार्ग से चल कर कैसे व्यवस्था को स्वतंत्र बनायेंगे ?? ये तो फिर एक नयी गुलामी की तैयारी हो रही है जिसमे पूंजीपति वर्ग को ही फायदा होगा ?? आम जनता की स्वतंत्रता के लिए जो जमीनी काम होना चाहिए वो तो आज तक आपने शुरू ही नहीं किया।।??? इस प्रकार के सवालों से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी घबरा गयी और उन कार्यकर्ताओं का बहिस्कार शुरू कर दिया।
तब उन्ही बहीस्कृत कार्यकर्ताओं ने पार्टी से नाता तोड़ कर पश्चिमी बंगाल से अपना अलग आन्दोलन शुरू किया। इस प्रकार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हुए कार्यकर्ताओ "चारू मजूमदार" "जंगल संथाल" और कनु सान्याल के नेतृत्व में बंगाल के तीन गांवो "खाडीबाडी , फांसीदेवा ओर नक्सलबाड़ी नाम के गांव से आन्दोलन की शुरुआत हुई ...जो की आगे चलकर "नक्सलवादी आन्दोलन" कहलाया और इसके कार्यकर्ता "नक्सली" कहलाने लगे।चूंकि ये आन्दोलन उत्पादन व्यवस्था को किसी भी निजी फायदे से अलग रखने में यकीन रखता था और राज्य (नौकरशाही, आर्मी ,पोलिस, और न्यायलय) को सिर्फ इसके रक्षक के रूप में स्थापित करना चाहता था, लेकिन बहुत छोटे स्तर और स्टेट के द्वारा लगाये गये तमाम दवाबो और प्रतिबन्धो के चालते पहले चरण मे भूमि सुधार आन्दोलन चलाया गया जिसके तहत बड़े बड़े जमींदारों से उनकी जमीन लेकर सामूहिक खेती और उत्पादन को बढ़ावा दिया गया, जाहिर है की इसमें जमींदार आसानी से राजी नहीं हुए और राज्य द्वारा कानूनी और गैरकानूनी तरीको से नक्सलियों के खिलाफ हिंसात्मक प्रतिरोध करना शुरू किया ,जिसका नक्सालियो को पहले से ही अंदाजा था और उन्होंने भी इसके लिए अपनी मिलिशिया तैयार करी हुई थी, जिसका उन्होंने जमींदारों की ही भाषा में जवाब दिया । मार्क्स और एंगेल्स के द्वारा लिखित कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के सिद्धांतो के आधार पर उतपादन के साधनों का राष्ट्रिय करण
और निजी मुनाफे के सिस्टम को ख़तम करने जैसे पवित्र उद्देश्यों को लेकर जब ये आन्दोलन आगे बढ़ा तो सारे देश के युवा वर्ग ने इसे हाथो हाथ लिया और तमाम विद्यार्थी वर्ग भी इसमें कूद पडा,कहा जाता है की उस समय कलकत्ता और दिल्ली और देश के कई बड़े शहरो के सभी रेलवे स्टेशनों पर पुलिस बल लगा दिया गया था जो हर आदमी से खासकरके अगर वो युवा है तो पूरी पड़ताल करने के बाद ही बंगाल जाने वाली गाडियों में जाने की इजाजत देता था। परंतू ये आन्दोलन बजाये कम होने के और विकराल रूप धारण करता गया , उस समय इस आन्दोलन को करीब से देखने वालो से बात करने पर पता चला की कलकत्ता के कई मेडिकल कॉलेज पूरे के पूरे ही खाली हो गए थे जिसके सारे स्टूडेंटस अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर आन्दोलन में शामिल हो गए और नक्सली बन गए। उस समय बंगाल की सरकार और जब पूरे राज्य की पुलिस आन्दोलन को रोकने में नाकामयाब रही तब केंद्र में सत्तारूढ़ इंदिरा गाँधी की सरकार से मदद मांगी गयी , और फिर शुरू हुआ आन्दोलन को कुचलने का एक विभत्स खेल। चूंकि ये वो समय था जब देश की बहुसंख्यक जनता दरिद्रता के दलदल में फंसी हुई थी और राजनैतिक अस्थिरता की वजह से देश में इमरजेंसी के हालात बनने शुरू हो गए थे, जिस वजह से आन्दोलन को कुचलने में सारे नियम कानून को ताक पर रख दिया गया और बंगाल सरकार और केंद्र ने मिल कर दुर्दांत हिंसा का सहारा लेकर आन्दोलन को कुचलना शुरू किया . ये दमन कितना भयंकर था इस बात का अंदाजा आप लगा सकते है की बंगाल के कई गाँवों में उस समय किसी भी युवा वर्ग को जिसकी उम्र 14-15 साल से ज्यादा हो , ज़िंदा नहीं छोड़ा गया था।
इस प्रकार आन्दोलन के एक चरण में 1972 में कामरेड चारू मजूमदार को पकड़ लिया गया , और मात्र 12 दिन में जेल में उनकी म्रत्यु हो गयी (असल में उनकी ह्त्या हुई थी, वो दमे से पीड़ित थे और बिमारी की हालत में उनके मुहह से ओक्सीजन मास्क हटा दिया था ). इस घटना ने आन्दोलन को और भड़का दिया जिससे की वो बंगाल के आलावा और राज्यों में भी फ़ैल गया।
फिलहाल ज्यादा डीटेल में ना जाते हुए बस इतना समझ लीजिये की अंततः आन्दोलन को हिंसात्मक दमन के द्वारा बहुत कमजोर कर दिया गया और नक्सलियो की गतिविधिया बहुत हद तक रोक दी गयी या फिर एक क्षेत्र तक सिमित रह गयी। उसके बाद कई सालो तक खुद नक्सली पार्टी (CPIML) सिद्धांतो और आन्दोलन चलाने के तरीको के अंतरविरोधो के चलते आपसी अंतर्द्वंद में उलझी रही , जिसकी परिणिति ये रही की नक्सली पार्टी खुद कई सारे ग्रुप्स में बंट गयी और अपने अपने प्रभाव क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से सामानांतर रूप से अपनी अघोषित शाशन व्यवस्था चलाने लगी।जिसमे 1975 से लेकर 1980तक कई गुट बने और बिगड़े और कई ग्रुप मजबूत भी हुए।अंततः 90 के दशक तक आते आते दो प्रमुख नक्सली पार्टिया सबसे मजबूत अवस्था में अपने को टिका के रह पायी, यें थी माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) या पीपल्स वार ग्रुप (PWG) . MCC मुख्यतः बिहार और बंगाल में मजबूत थी और PWG आन्ध्र प्रदेश में आदिवासी के हको के लिए लड़ते हुए स्टेट से भी संघर्ष रत थी। लेकिन दोनों पार्टियों के जनता के बीच में काम करने और सिद्धांतो को लेकर अन्तर्विरोध था। और सन 2004 में दोनों पार्टी के नेताओं ने सैधांतिक मतभेदों को दूर करते हुए दोनों पार्टी के विलय के बाद नयी पार्टी की घोषणा करी। जिसका नाम रखा गया " भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी )" या CPI (Mao).
ये पार्टी आज भी भारत को देशी-विदेशी पूँजी का गुलाम मानती है और ये मानती है की जब तक उत्पादन के साधन और उसके वितरण का अधिकार पूंजीपतियों से छीन कर जनता को नहीं दिया जायेगा तब तक भारत की जनता गुलामी से मुक्त नहीं हो सकती। ये पार्टी मानती है की आज के भारत में सभी राजनितिक पार्टिया सिर्फ पूंजीपतियों के दलालों या एजेंटो के रूप में काम करती है , जो की निजी रूप से उनसे पैसा लेती है और सत्ता में आने के बाद कानूनी या गैरकानूनी रूप से भारत के संसाधनों को पूंजीपतियों को कौड़ियो के भाव में बेच देती है। उसके बाद पूंजीपति अपने मुनाफे के लिए जनता के सस्ते श्रम का फायदा उठा आकर अपना मुनाफा कमाता है और अपनी मर्जी के हिसाब से उत्पादन को घटता या बढाता रहता है , इस प्रक्रिया में बहुसंख्यक जनता को घोर गरीबी और बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है , जिससे पूंजीपति को कोई सरोकार नहीं होता। और जब जनता इसी से त्रस्त आकर व्यवस्था के खिलाफ उठ कड़ी होती है तो येही पूंजीपति अपनी एजेंट सत्तारूढ़ पार्टी से जनता का दमन करवाता है , सरकार भी पहले तो जनता की ताकत को जाती, धरम और क्षेत्र के नाम पर तोड़ने की कोशिश करती है , लेकिन जब इससे बात नहीं बनती तो वो हिंसात्मक दमन पर उतर आती है .
इस प्रकार के आन्दोलन आज भारत के लगभग हर हिस्से में चलते रहते है लेकिन येही आन्दोलन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी ) अपनी खुद की हथियार बंध सेना के साथ चलाती है जिसमे बहुसंख्यक रूप से आदिवासी और गरीब मजदूर लोग है। ये आन्दोलन अब तक भारत के 200 से ज्यादा जिलो में फ़ैल चूका है और इसमें लगभग 20 हजार से ज्यादा लड़ाके सशत्र रूप से संघर्षरत है (जो की भारत की थल सेना का लगभग 15-20% के बराबर है ). BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर नक्सली इसी संख्या में बढ़ते रहे तो 2050 तक ये लोग भारतीय स्टेट पर रूप से कब्जा कर सकते है, और खुद नक्सलियों के दिवंगत शीर्ष नेता किशन जी का दावा था की वो लोग 2050 से कहीं पहले ये काम को अंजाम दे सकते है .जाहिर है जब किसी ग्रुप के इरादे इतने पक्के और खरनाक हो तो सरकार उनसे एक साथ कई मोर्चो पर लड़ाई करती है , या ये कहे की माओवादी कोई इधर उधर के बहाने ना बनाते हुए सीधे सीधे इस तंत्र को बल पूर्वक उखाड़ फेंकने की बात करते है तो सरकार उन्हें रोकने कमजोर करने और नष्ट करने के लिए हर हथकंडे अपनाती है .
खैर सब अपने अपने दावे करते है - सरकार कहती है की ये लोग बेकसूरों को मारते है , पब्लिक प्रोपर्टी को नुक्सान पहुचाते है , और नक्सली कहते है की हम जनता के लिए लड़ने वाले खुद जनता को क्यों मरेंगे, क्योंकि हमारे लड़ाके और सैनिक तो खुद ही जनता है तो उन्हें मार कर हम कैसे उन्हें अपने साथ ला सकते है , इसलिए ये सरकार के हमें बदनाम करने का षड्यंत्र है। इन्हें रोकने के लिए सरकार कभी रणवीर सेना, सलवा जुदम जैसे राज्य पोषित और अपराधियों के सशत्र संगठन बनवाती है, और कभी खुद किसी फर्जी और तथाकथित नक्सली ग्रुप से जबरन वसूली, बलात्कार और बेकसूरों को मरवाकर नक्सलवादियो को बदनाम करने की कोशिश करती है।
निष्कर्ष के तौर पर ये कहा जा सकता है की ये सबके अपने अपने विवेक पर निर्भर करता है की वो नक्सलियों की प्रक्टिस को सही मानता है या गलत , सरकार को सही मानता है या गलत।
लेकिन आज भी ये सवाल हम सबके सामने मुह बांये खडा है की " क्यों आज तक की सरकारे आदिवासियों का विकास करके उन्हें नक्सलियों की जमात से बाहर नहीं खींच पायी, आखिर क्यों आज भी भारत के हर राज्य के कई क्षेत्रो में हजारो लोग सुबह सुबह जंगल जाते है और लकडिया बीन कर उन्हें बेच कर अपना घर बार चलाते है ,इन्हें आज भी 65 साल बाद आजादी का मतलब नहीं पता चल पाया . और 40 साल में हजारो नक्सलियों को मारने के बावजूद भी भारत में बनने वाली सरकारे आज तक नक्सली विचारधारा को गलत साबित क्यों नहीं कर पायी" जिसका सबूत ये है की आज भी नक्सली दिन-ब -दिन सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ और मजबूत होते जा रहे है।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

नास्तिक वो बला है..





















नास्तिक वो बला है जो चिल्लाता है की मैं नास्तिक हूँ . क्योंकि वो सच्चे अर्थो में नास्तिक है।  
वो कर्म करता है , और फल की इच्छा में कर्म करता है,  क्योंकि वो जानता है की उसके  " श्रम " में वो ताकत है जो उसे परिणाम देगी , वो इतिहास से प्रेरणा लेता है , वो विज्ञान पर विश्वास करता है , वो सवाल करने की हिम्मत रखता है ,वो गलत बात के लिए अपने शिक्षको और अपने बॉस से भी तर्क कर लेता है , वो समाज के मनोविज्ञान को समझता है , वो लोगो के मनोविज्ञान को समझता है , तभी वो अपने विरोधियो से भी प्यार करता है ,अपनी गलती मानने की हिम्मत रखता है, दूसरो की गलती को गलत सिद्ध करने की तार्किक क्षमता रखता है . वो अपने शरीर को समझता है , वो जनता है की शरीर की जैव रासायनिक क्रिया ख़तम होने पर वो मर जाएगा, वो किसी पुनर्जनम को नहीं मानता ,उसे पता होता है की उसे सिर्फ एक जीवन मिला है जीने के लिए . उसके मरने के बाद कुछ नहीं होगा उसके लिए .वो स्वर्ग और नरक इसी दुनिया में देखता है , वो धर्म के सिद्धांतो को अपने तर्कों से ठोकरों पर उडाता है , वो धरम ग्रंथो को मक्कार, हरामखोरो, सत्ता के दलालों ,चाटुकारों, जनता को ठगने ,शोषण करने वालो द्वारा रचित झूठ के पुलिंदे भर मानता है !  धार्मिक लोग गलत काम करते है और फिर भगवान् के सामने चढ़ावे और यात्राओं के जरिये उनकी माफ़ी मांगते है . नास्तिक को ये सुविधाए प्राप्त नहीं है , वो जानता है की उसके गलत कामो को कोई क्षमा करने वाला नहीं है , इसलिए वो गलत काम नहीं करता, और गलति करता भी है तो उसे सुधारने का जतन करता है। वो अपनी गलतिया मानने की हिम्मत रखता है वो अपने छोटो से भी माफ़ी माँगता है , और वो अच्छा ,अच्छा और अच्छा बनता चला जाता है। वो दिमागी रूप से जाग्रत होता है वो अगर 20 साल तक किसी को तहे दिल से माने ,और अगर वो गलत काम कर दे तो, वो उसका विरोध करने की भी ताकत रखता है !वो जानता है की वो अपने माता पिता  से पैदा है और उसकी संताने उससे पैदा हुई है वो मानव विकास के क्रम  को समझता है . इसलिए वो सबसे मोहब्बत करता है . वो जीने का भरपूर मजा लेता है , वो जानता है की दुनिया में हर चीज मानव ने ही बनायी है , वो जानता है की ये दुनिया अपने आप बनी है , वो जानता है की पूरी श्रष्टि , ब्रह्माण्ड और दुनिया अपने आप को चलाने में खुद सक्षम है उसे पता होता है की जिन सवालों का जवाब उसके पास नहीं है उन सवालों का जवाब भविष्य की आने वाली नसले खोज लेंगी . वो अनसुलझे सवालों का जवाब भगवान् की सत्ता में नहीं खोजता। वो भगवान् की सत्ता को खारिज करता है। वो चिल्लाता है की अगर दम है तो भगवान् मेरा कुछ बिगाड़ के दिखाए .वो अपने दुखो और परेशानियों के कारण खुद खोज कर उन्हें हल करता है . वो परिवर्तन से नहीं घबराता , वो आँख मूँद कर किसी सिद्धांत पर यकीन नहीं करता , वो उसका अध्यन करके उसको परखता है .वो  अपने आपको असीम संभावनाओं से भरा मानता है वो लिखने की कोशिश करता है , वो कविता कहने की कोशिश करता है. वो नाचता है वो गाता है ! वो मानव समाज की असीम शक्ति और उत्पादन क्षमता को जानता है , उसे विरोधी शक्तियों की समझ होती है, वो इससे निकलने के उपाय जानता है , इसलिए वो हर शोषण कारी शक्ति के खिलाफ बगावत करता है , अपनी क्षमता के हिसाब से वो सामजिक बदलाव के लिए प्रयास करता है , वो पढता है , समझता है फिर सोचता है, वो अंधभक्ति नहीं करता। वो जानता है की ये दुनिया उसके लिए है , उसके माँ बाप और उसके बच्चो  के लिए है उसके दोस्तों के लिए है हर इंसान के लिये है ,हर मजदूर के लिए है ,वो किसी जमीन के टुकड़े को देश नहीं मानता, वो जनता को देश मानता है ,वो अपने देश से प्यार करता है वो दुसरे देश से प्यार करता है वो हर देश के लोगो को अपना भाई मानता है वो कोई रंग , नस्ल,जाती, धर्म ,सम्प्रदाय को नहीं मानता ,वो सिर्फ इंसान को मानता है .वो जानता है की उसकी म्रत्यु कभी भी हो सकती है , वो अपने लिए जीने के तरीके खोजता है. वो किसी मोक्ष और निर्वाण को नहीं मानता , वो अच्छे इंसान के रूप में ढलने को ही मोक्ष मानता है वो शोषण के खिलाफ जनता के संघर्ष को ही जीवन यात्रा मानता है .वो ज्योतिष, अरदास, नमाज,पूजा, पाठ, छुआछुत, कर्मकांड, धार्मिक गुरु , पंडो , पादरियों , मुल्लो, पीर, फ़कीर ,मजार मंदिर,मस्जिद ,गिरिजा,   और उनके चमत्कारों पर हंसता है ,वो इनसे चंगुल से बचने के लिए लोगो को समझाता है ..वो अपनी नास्तिकता पर गर्व करता है ,
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(विनोद हौंसलेवाला "बाग़ी " को समर्पित )

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

"मार्क्सवाद" और भारत में जाती व्यवस्था

फेसबुक पर हमारे एक मित्र "प्रचंड नाग जी" ने अपने कुछ सवालात रखे,  विषय था की ""मार्क्सवाद के अनुसार भारत में जाती व्यवस्था से उत्पन्न शोषण के लिए क्या समाधान हो सकता है"
मैंने उनके सवालों का अपने अनुसार जवाब देने की कोशिश करी और ये सम्पूर्ण बहस एक लेख के रूप में संकलित कर दिया ,जिससे अन्य  साथियों की प्रतिक्रया भी जान सकू।





प्रचंड नाग जी  --
भारत में ब्राह्मण पूंजीपति नहीं थे लेकिन शोषण था व अब भी है । शूद्र-अतिशूद्र को अपने मनपसंद व्यवसाय करने से भी रोका जाता है । इस व्यवस्था को उखाड़ने के बारे में मार्क्स क्या कहते हैं

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  • उत्तर -
    आप ये जानते ही होंगे की किसी भी व्यवस्था में शोषण करने के लिए शाशक वर्ग सिर्फ बल प्रयोग से ही व्यवस्था को टिकाये नहीं रख सकता,,उसके लिए जनता को जात धरम और क्षेत्र के नाम से बाटना और समाज में जनता के बीच वर्गों का होना जरुरी होता है, और ये वर्ग आर्थिक , जात और धरम के नाम पर पैदा किये जाते है।
    सबसे पहले तो ये जानिए की भारत में पूँजी वाद कभी सही से डेवलप हो ही नहीं पाया ! आज भारतीय समाज एक अर्ध सामंती अर्ध पूंजीवादी देश है, मतलब की इसके पारंपरिक ढांचा तो सामन्ती है और आधौगिक विकास विदेशी पूँजी के माध्यम से हुआ है , लेकिन पिछले कुछ सालो में अब खुद देशी पूंजीपति भी बहुत मजबूत हुए है .
    ब्राह्मणों द्वारा या तथाकथित उन्ची जातियों द्वारा निचले तबके के लोगो का शोषण एक सामंती लक्षण है,,,मतलब की राजे महाराजे और जमींदारों वाला सिस्टम , कुछ यूँ समझिये की गरीबो या तथा कथित निचली जातियों के शोषण का चक्र हजारो साल पहले हुआ था , जिसमे उस समय भी सत्ता पर काबिज लोग जनता का शोषण करने के लिए बल प्रयोग के साथ साथ उन्हें सांस्क्रतिक रूप से भी दिमागी रूप से गुलाम बना कर रखते थे,,

  • 1- जैसे की 84 हजार योनियो वाला सिद्धांत
    2- कर्म करो फल की इच्छा मत करो वाला सिद्धांत
    3- राजा पिता सामान है, प्रजा को राजा की सेवा करनी चाहिए आदि आदि ..

  • जनता में वर्ण व्यवस्था को धर्मग्रंथो के माध्यम से जायज ठहराया गया , और फिर पूर्व्जनाम की थिओरि जनता को समझाई जाती थी, जिससे की लोग दिमागी रूप से गुलाम हो जाते थे और चुपचाप शोषण का शिकार होते रहते थे,की कंही अगले जनम में पशु योनि में ना चले जाये ,और इन सब बातो को जनता में पहुचाने और थोपने का जिम्मा ब्राह्मण बिरादरी को दिया गया ! जिसके तहत  तमाम
    धर्मग्रन्थ लिखे गए जिनका मुख्य सन्देश ये था की , आपके सुख दुःख को नियंत्रण करने वाला भगवान् है और आपका काम है की चुप चाप राजा (शाशक ) वर्ग की सेवा करो .अब अगर कोई शोषित वर्ग या शुद्र ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करता था तो उसका बलात हनन कर दिया जाता था,
    रामायण में शम्बूक और महाभारत में एकलव्य इसी विद्रोह को दबाने के उद्दरहण के रूप में समझे जा सकते है .लेकिन जो लोग शाशक वर्ग के लिए खतरा नहीं होते थे उन्हें अपने ग्रंथो में प्रशंषित किया जाता था. शबरी और केवट का उद्दरहण आपके सामने है जिसके द्वारा ये संदेश देने की कोशिश की गयी की राजा के प्रति भक्ति भाव रखो और ज्ञान प्राप्त करने या विद्रोह करने की मत सोचो, क्योंकि उन्ही की सेवा करके आप 84 हजार योनियो के चक्कर से बच सकते हो आदि आदि .
    तो ब्राह्मण जाती और तमाम और साधन इस व्यवस्था को टिकाये रखने के टूल के रूप में काम करते थे . जो की बाद में और विभत्स होता गया,,,परन्तु व्यवस्था के मूल में भी वोही भाव था,. की उत्पादन के साधनों (व्यापार, खेती, उद्योग धंधो ) पर शशक वर्ग का कब्जा रहे और जनता का शोषण चलता रहे और जनता में सभी शामिल थे शूद्र , माध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर हर जाती के लोग .और इनके बीच भी वोही सड़े हुए सामन्ती संस्कार और अंतर ज़िंदा रहे (जात पात आदि ) ,क्योंकि व्यवस्था में सबसे ऊपर सता पक्ष के लोगो का भाव शोषण करने का था,,ना की जनता की सेवा का,,इसी लिए ये अंतर बनाए रखे गए शोषण को जारी रखने के लिए .
    सार के रूप में बस ये जानिये की शोषक वर्ग का एकमात्र लक्ष्य अपना मुनाफा बढ़ाना और शोषण करना होता है ,
  • प्रचंड नाग जी  --  निजी मुनाफे से रहित समाज कब परिपक्व हो जाता है ? कितना समय लगता है ? कोई उदाहरण ?***********************************************
    उत्तर -
    ये इस बात पर निर्भर करता है की मजदूरों की पार्टी कितनी मजबूत है .मतलब अगर उसका सत्ता ( न्यायालय + नौकर शाही + फ़ौज पुलिस ) पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए और ये तब हो सकता है जब उत्पादन के साधनों ( उद्योग,खेती, खानों , बैंक , सूचना प्रसारण और अन्य प्रमुख संस्थान ) पर जनता का कब्जा होना चाहिए .
    जब स्टेट मशीनरी और सत्ता ये सुनिश्चित कर लेती है तब समाज का आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक सकारात्मक विकास होता है और सारे सड़े हुए सामन्ती बंधन टूट जाते है और वर्गों का आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर मिट जाता है .
    इसमें समय के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता इसमें 50-100 या 200 साल भी लग सकते है ,क्योंकि जो पार्टी निजी मुनाफे पर आधारित व्यवस्था को बर्बाद करेगी तो पूंजीपति वर्ग उसे दोबारा वापस पाने के लिए हर कदम उठाएगा ,और ये संघर्ष निश्चित रूप से हिंसक होगा।यहाँ पर मजदूरो की मशीनरी (फ़ौज +पुलिस) पूंजीपति वर्ग का विनाश सुनिश्चित करेगी ,मतलब मजदूरो की तानाशाही की जरुरत पड़ेगी,
    उद्दरहण के रूप में आप रूस और चीन की क्रांति के बारे में पढ़ सकते है ,,जिसमे उन्होंने 50-100 सालो तक जनयुद्ध चला कर मजदूरो की सत्ता की स्थापना करी और उतपादन के साधनों का राष्ट्रीयकरन कर दिया .जिससे समाज में जाट पात और धरम के अंतर खुद बा खुद मिटने शुरू हो गए थे .

    (रूस और चीन के टूटने की वजह एक अलग विषय है,,,,,आप चाह्हे तो इस पर अलग से डिस्कस कर सकते है )
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  • प्रचंड नाग जी  --(1) लोगों की गरीबी नष्ट होने से क्या कोई जाति-धर्म त्याग देता है ?
    (2) मजदूरों के शोषण को उत्पादन के साधनों पर कब्जा करके खत्म किया जा सकता है । जाति के आधार शोषण को उत्पादन के साधनों पर कब्जा करके कैसे नष्ट किया जा सकता है ?
    (3) केन्सर के बेक्टीरिया को खत्म करने वाली दवाई से क्या टीबी का बेक्टीरिया खत्म किया जा सकता है ?
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    उत्तर -
    ये आपके सवाल सामन्ती संस्कारों को ध्यान में रखते हुए किये गए है .आप उस समाज की कल्पना करिए की जहा पर एक सीवर लाइन साफ़ करने वाले मजदूर और फक्ट्री में एक मनेजर की आमदनी में कोई ख़ास फरक नहीं होगा,,,दोनों को बुढापे में पेन्सन मिलेगी, बच्चो की सिक्षा और उनके भविष्य के रोजगार की जिम्मेदारी सरकार की होगी, सभी स्कूल सामान होंगे, सभी अस्पताल सामान होंगे,और इलाज लगभग मुफ्त होगा।
    ऐसे समाज में किसकी क्या जाती है किसी को कोई मतलब नहीं होगा और अगर कोई तथाकथित रूप से भंगी जाती का है तो भी वो किसी की कोई परवाह अहि करेगा,,,,क्योंकि उसके बच्चे भी उसी स्कूल में पढेंगे जहा एक ब्राह्मण के, वो भी वंही  इलाज करवाएगा जहा एक तथाकथित सवर्ण  जाती का इंसान इलाज करवायेगा।
    और जाती एक व्यक्तिगत मसला होगा, लेकिन फिर भी अगर कोई जात के आधार पर भेद करने को कोशिश करेगा तो उसके लिए कानून होंगे .इसे कोई यूटोपियन सिद्धांत मत समझिएगा ये एक प्रयोग हो चुकी व्यवस्था है . और एक दो नहीं पूरे 80 साल तक ये चला था .
    ( ये फिर क्यों टूट गया ---ये अलग बहस का विषय है ,,,आप चाहे तो इस विषय पर भी बात हो सकती है )

  • प्रचंड नाग जी  --  केन्सर के बेक्टीरिया को खत्म करने वाली दवाई से क्या टीबी का बेक्टीरिया खत्म किया जा सकता है ?
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  • उत्तर -मार्क्सवाद ने अनुसार यहाँ पर कोशिश ये होनी चाहिए  कीऐसा माहौल हो की जिसमे किसी भी प्रकार के बैक्टीरिया पैदा ही नहीं होगा , क्योंकि सभी बीमारियों के बैक्टीरिया गन्दगी में पैदा होते है . और वो गन्दगी है पूंजीवादी सिस्टम जो की सिर्फ मुनाफ़ा कमाने और शोषण पर आधारित होता है  जब ये गन्दगी ख़तम हो जायेगी तो बैक्टीरिया भी अपने आप ख़तम हो जायेंगे ,,और बैक्टीरिया पैदा करने वालो को भी क्रांतिकारी ताकतों के द्वारा ख़तम कर दिया जाएगा
  • प्रचंड नाग जी  --  मजदूरों की सत्ता कैसे चुनी जाएगी ? मजदूरों की पार्टी कौन सी होगी यह कौन निर्धारित करेगा ? वे कौन होंगे जो पूंजीवादी व्यवस्था से बचाएंगे ?************************************************
  • उत्तर -
    आपके इस सवाल का जवाब शायद इस लेख में मिल जाए . पहले स्पष्ट करना चाहूँगा की मैं नक्सलियों की हिंसा का समर्थन नहीं करता लेकिन ये लेख उनके सिद्धांत को समझने की कोशिश मात्र है
    http://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200221202949931&set=o.487351021298933&type=1&theater

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

आतंकवादी

नेता - ये आतंकवादी है ,,,,,,,ये सब आतंकवादी होते है
भीड़ - अच्छा ,,,लेकिन  ...??.
नेता - लेकिन वेकिन कुछ नहीं ....ये आतंकवादी ही है ,,ये सब आतंकवादी है
भीड़ - हां ,,,,लगता तो है ...शायद नेताजी सही कह रहे है
नेता - इन्होने स्कूल की ईमारत तोड़ दी , इन्होने रेलगाड़ी में बम फोड़ दिया .देखो ये लोग आतकवादी है
भीड़ - हां नेताजी शायद आप सही कह रहे हो .
नेता - हां हम सही कह रहे है,,,टीवी पर समाचार देखो, वो भी येही कहते है - ये आतंकवादी है .
भीड़ - लेकिन ये तो गरीब जंगली लोग है
नेता - गरीबो के पास बन्दूक कहा से आई ?,,,,,गरीबो के पास बन्दूक नहीं हो सकती,,,,ये आतंकवादी ही है।
भीड़ - हां ,,आप सही कह रहे हो,
भीड़ - मारो ,,मारो सालो को ,ये देश के लिए ख़तरा है। इनपे बम गिराओ, टैंक चलाओ , ख़तम कर दो सबको ..
मारो इन आतंकवादियों को,,मारो मारो मारो मारो।
नेता - बोलो भारत माता  की जय
भीड़ - भारत माता की जय . भारत माता की जय। भारत माता की जय
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नेता  - सर टेंडर निकलवा दें बाक्साईट की खानों का ... ....???
सिंघानिया साहब - हांजी सर निकलवा दीजिये,,,,और धन्यवाद .

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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

एक कविता

शायद कई भाइयो को बुरा लगे ,,,,,
लेकिन मैंने आज तक पूरी जिन्दगी में यही तजुर्बा  किया है की " इस मुल्क में पढ़े लिखे जाहिल लोगो की तादात शायद अफ्रीका महादीप की कुल आबादी से भी ज्यादा है।मेरे उन्ही पढ़े लिखे जाहिल भाइयो को समर्पित एक कविता .....कविता क्या बस ये समझ लीजिये की  "बकैती" मारी है।

पूरी बकैती एक साँस में ख़तम करनी है  ....तो चलिए शुरू करते है ...दोनों हथेली फैला कर मारिये ताली और बोलिए ...हान्जी 
हमने अंग्रेजो को भगा कर देश स्वतंत्र करा लिया ...............हान्जी
हमने भारत में 1947 में अगस्त क्रांति कर दी ..................हान्जी
भारत में समाजवाद आ गया ........................................हान्जी
भारत 20  साल में  सबसे शक्तिशाली देश होगा .................हान्जी
हमने हरित क्रांति कर दी .............................................हान्जी
चीन हमारा दुश्मन है ...................................................हान्जी
हमने चीन को हरा दिया ..............................................हान्जी
पकिस्तान हमारा दुश्मन है ..........................................हान्जी
हमने पकिस्तान को हरा दिया ......................................हान्जी
हमने पकिस्तान को फिर से हरा दिया ...........................हान्जी
भारत अगले 20 साल में  सबसे बड़ी इकोनोमी बनेगा .......हान्जी
भारत परमाणु शक्ति संपन्न बन गया ...........................हान्जी
गणेश जी ने दूध पी लिया ..........................................हान्जी
क्यों पी लिया ..........................................................हान्जी
बस मन करा पी लिया .............................................हान्जी
लड्डू से बोर हो गए इसलिए दूध पी लिया ...................हान्जी
भारत ने कारगिल युद्ध जीत लिया ..............................हान्जी
कांग्रेस का हाथ गरीबो के साथ ...................................हान्जी
पकिस्तान हमारा दुश्मन है ........................................हान्जी
ट्वीन टावर लादेन ने गिरवाया ....................................हान्जी
गाज़ा और फिलिस्तानी आतंकवादी है ..........................हान्जी

हमारे वेद जर्मनी वाले चुरा के ले गए .........................हान्जी
वेदों को मुसलमानों ने एडिट कर दिया .........................हान्जी
रावन बुरा था .........................................................हान्जी
राम अच्छे थे .........................................................हान्जी
सानिया मिर्जा बुरी है ..............................................हान्जी
साइना नेहवाल अच्छी  है ...........................................हान्जी
भंगी चमार ....हरामी होते है .....................................हान्जी
कम्युनिस्ट चीनी एजेंट होते है ....................................हान्जी
वाल मार्ट से भारत को  नुक्सान नहीं होगा ...................हान्जी
भारतीय सेना में भ्रष्टाचार नहीं है ................................हान्जी
अन्ना ही क्रांति कर सकते है ....................................हान्जी
अमिताभ राजीव गाँधी के मित्र है ...............................हान्जी
अमिताभ मुलायम जी के मित्र है ...............................हान्जी
अमिताभ मोदी के मित्र है ........................................हान्जी
अटल जी ही देश सुधार सकते है ..............................हान्जी
आरएसएस देशभक्त है .............................................हान्जी
मुसलमान गद्दार होते है ..........................................हान्जी
रामदेव एड्स का इलाज कर सकता है .......................हान्जी
रामदेव की उम्र 105 साल है ......................................हान्जी
नरेन्द्र मोदी विकास पुरुष है ......................................हान्जी
दिल्ली मेट्रो रेल गुजरात में बनती है .........................हान्जी
भारत विश्व गुरु बनेगा ............................................हान्जी
ये अंतहीन कविता है .............................................हान्जी
आप भी अपने अनुभव जोड़े ....................................हान्जी

कविता पूरी पढ़ ली .??.......................................................हान्जी
आप कुढ़ गए ....??................................................................हान्जी फिलिस्तानियो का समर्थन अच्छा नहीं लगा ..??...................हान्जी
सानिया और साइना की तुलनाअच्छी नहीं लगी .??...............हान्जी


गुरु हिन्दुस्तान में जम्हूरियत है ...जो मर्जी आएगी वो लिखेंगे ..
  

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

शुद्धिकरण


{शुद्धिकरण }

बाजार से वापस लौटते हुए घर में मेरे ताऊ जी धडधडाते हुए गुस्से में आये  ...और जोर जोर से चिल्लाने लगे ..
" सत्यानाश हो जाए उस नाश पिटे का....बेशरम कही के ,ना जाने कब सुधरेंगे,,,,
मैं बोला   "अरे ताऊ जी क्या हो गया,,किसी ने कुछ बोला हो तो बताओ,,अभी मैं जाता हूँ ...."
अरे कुछ नहीं बेटा  .... पीछे अग्रवाल  साहब वाली गली में से आ रहा था, ,,,तभी एक गंदा सा कूड़ा बीनने वाला बच्चा गली में घुस कर लगा गन्दगी से खेलने,,,और अन्धो की तरह मुझसे टकरा गया .
नामुराद जब देख रहा है की छोटी सी गली है तो रुक नहीं सकता था,,,की मैं निकल जाऊ तब घुसे , सब गंदा कर दिया साले ने ..
जा बेटा ज़रा पूजा की अलमारी से गंगाजल निकाल के ले आ ..
"ताऊ जी ...गंगा जल तो ख़तम हो गया ..."
अरे तो ऊपर वाले खाने में गौमूत्र रखा है . उसे ले आ .
वापस आकर देखा तो ताऊ जी नहा कर वापस आ गए थे ....उन्होंने मुझे कुछ बूँद गौमूत्र  लेकर पीया ,,और बोले

""ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।"""

मैं खडा खडा सोच रहा था अपने महान धरम के बारे में , जो इंसानों को इंसानों के छूने मात्र से अपवित्र करता है ,,और जानवरों के मूत्र से शुद्धिकरण कर देता है।