शनिवार, 28 सितंबर 2013

दो कविताएं मेरी ...


1 - पूर्वाग्रह - 
पूर्वाग्रह
  बहुत खतरनाक होता है
पूर्वाग्रह आपके चरित्र , आपके ज्ञान ,आपके व्यक्तित्व को
हमेशा एक जगह रोके रखता है
ये आपको नफरत सिखाता है
नफरत जो की अगली पीढ़ी में चली जाती है
फिर अगली सभी पीढ़िया भी इसे अपना गुणधर्म बना लेती है
पूर्वाग्रह एक पूरी कौम को वहशी बर्बर और आतंकी घोषित कर सकता  है
पूर्वाग्रह अपने अन्दर की गलतियों और कमियों को डिस्काउंट देता है

पूर्वाग्रह का दूसरा नाम शुतुरमुर्ग भी हो सकता है .
शुतुरमुर्ग बहुत बड़ा होता है ..बिलकुल पूर्वाग्रह की तरह .
लेकिन इसे बचाए रखने के लिए सच्चाई की आंधी आने पर ..
आपको शुतुरमुर्ग की तरह अपना सर जमीन के अन्दर धंसाना होता है
पूर्वाग्रह का सर हमेशा सच्चाई से दूर जमीन के अन्दर धंसा होता है .
तभी ये अपना अस्तित्व बचाए रख सकता है
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2 - धार्मिक लोग
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कुछ लोग सच्चाई को नहीं स्वीकारते ...
ये जानते हुए भी की जो वो देख सुन रहे है सच है ,
वो खुद अपने मन और दिमाग को इधर उधर मोड़ते है
लेकिन सच्चाई को नहीं स्वीकारते .
वो उस सच्चाई को ना स्वीकारने के लिए मेहनत करते है ,
वो सच को ना स्वीकारने के लिए दुसरे की कमियों की खोज में रहते है .
दुसरे की कमी दीखते ही वो खुश हो जाते है .
फिर वो इसे अपना सूत्रवाक्य बना कर अपने झूठ को महान बताने लगते है .
लेकिन वो हमेशा डरते है , की कोई फिर दोबारा उन्हें सच्चाई ना दिखा दे .
वो इसे छुपाने के लिए फिर मेहनत करते है .
ऐसा अधिकतर धार्मिक लोग ज्यादा करते है .
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3 - गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ की एक कविता से प्रेरित _
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मनुष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही बार  जन्म नहीं लेते
वो सिर्फ तब ही जन्म नहीं लेते  जब उनकी माताएं उन्हें पैदा करती हैं
जीवन बार बार उन पर अहसान करता है कि वे स्वयं को जन्म दें.
धरती पर इंसान को अनगिनत मौके मिलते है की वो जनम लेते रहे
वो  समाज के गर्भ के गंदे  बेहूदगी  से भरे सड़े हुए पानी से बाहर निकले
जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है.

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सोमवार, 22 जुलाई 2013

एक कविता .......... गाज़ा के बच्चो के नाम ...

 हम जमे रहेंगे क़यामत तक इस धरती पर ..
देवदारु के वृक्ष की तरह
चीड़ की नुकीली फिसलन भरी पत्तियों की तरह हमारे बच्चे लेट जायेंगे अपनी भूमि पर .
और नहीं टिकने देंगे तुम्हारे लुटेरे  साम्रज्यवादी इरादों का पानी ....
दुनिया का हर कोना हम तुम्हारे लिए असुरक्षित बना देंगे ...
और दुनिया देखेगी की किस तरह तुमने हमारी नस्लों को जानवर बना दिया ..
मात्रभूमि ही हमारे लिए सब कुछ है ,,,घर ही सबकुछ है ..
पुरखे लड़े .,, हम लड़े ,,और मुस्तकबिल में लड़ेंगे हमारे बच्चे ..
जंजीरों की आखिरी कड़ी तोड़ने तक .....


शुक्रवार, 21 जून 2013

उत्तराखंड का हादसा

मंगलवार से शुरू राहत व बचाव कार्य के बाद अब तक 10 हजार लोग ही निकाले गए हैं। बाकी के बीस हजार कहां गए, इसका जवाब सरकार, शासन और प्रशासन के पास नहीं है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, गौरीकुंड से केदारनाथ धाम के 14 किमी के पैदल ट्रैक पर 4700 खच्चर चलते हैं। आपदा वाले दिन यह सभी बुक थे।
एक यात्री और एक खच्चर वाले को जोड़ दिया जाए तो इनकी संख्या 9400 पर पहुंच जाती है। इसी तरह पैदल ट्रैक पर 700 डंडी चलती है। एक डंडी को ले जाने के लिए चार लोग लगते हैं।
पीक सीजन में सभी डंडी चल रही थीं। यानी डंडी ले जाने वाले 2800 लोग हुए और उनमें बैठे 700 लोगों को मिलाकर कुल 3500 लोग हो जाते हैं। इसी तरह 500 कंडी संचालित होती है।
एक कंडी के साथ दो लोग होते हैं और एक यात्री बैठा होता है। इस तरह 1500 लोग यह भी हो जाते हैं। केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड तक में 250 होटल हैं। एक होटल में कम से कम चार कर्मचारी होते हैं। इस तरह 1000 तो होटल के कर्मचारी हो जाते हैं।
केदारनाथ में मौजूद होटलों में 6000 यात्रियों के रुकने की व्यवस्था है। इसी तरह गौरीकुंड में स्थित होटलों में 8000 यात्री ठहर सकते हैं। पीक सीजन होने के कारण सभी होटल फुल थे।
इसका मतलब यह हुआ कि दो जगहों पर 14,000 यात्री ठहरे हुए थे। इस रूट पर 700 सरकारी कर्मचारी भी हमेशा तैनात रहते हैं। स्थानीय व्यापारियों की संख्या भी 500 से अधिक रहती है।
सुलभ इंटरनेशनल के 120 कर्मचारी और 100 पुरोहित भी मौजूद थे। सभी को मिलाकर 30120 लोग तबाही वाली रात यहां थे। 10 हजार बचाए गए तो 20 हजार कहां गए-इसका जवाब कोई नहीं दे रहा है।
बहरहाल, 24,800 लोग अभी भी फंसे हुए हैं। बृहस्पतिवार को टिहरी से गुप्तकाशी तक केदारनाथ मोटर मार्ग यातायात के लिए खुल गया तो इस रास्ते से हजारों यात्री ऋषिकेश पहुंचाए गए। (< from Aaj Tak news)
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लोग आजकल उत्तराखंड की कांग्रेस की सरकार को गाली दे रहे है , कुछ समय बाद अगर बीजेपी शाशित राज्य में हादसा होगा तो बीजेपी को दोष दिया जाएगा .समस्या ये नहीं है की उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ढीली है जिस वजह से लोग अभी तक राहत मिलने से महरूम है .
समस्या ये है की इस मुल्क की पूरी व्यवस्था ही भरष्ट है .....चाहे उत्तराखंड का ये हादसा हो या बिहार की छठ पूजा , चाहे अमरनाथ की यात्रा हो या किसी गाँव की स्कूल की बिल्डिंग गिरने जैसी दुर्घटना ,,,इस मुल्क में सब कुछ हवा में चल रहा है , इंसान की जान का उसकी सुविधाओं का किसी सरकार को कोई कंसर्न नहीं है . वो अपने सत्ता के गणित भिडाने में लगी रहती है और ऐसे हादसात में भी पैसा बनती है . ये सारा बर्बादी का कारोबार तब तक चलता रहेगा जब तक की इस पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ कर नहीं फेंका जाएगा .

गुरुवार, 13 जून 2013

हुसैन को श्रधांजलि

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी ,,, निगाहो में उलझन दिलों में उदासी !
ये दुनियाँ हैं या, आलम-ए-बदहवासी ,,, ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं !!
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बीती 9 जून को उनकी पुण्यतिथी थी . जितनी ख़ामोशी से वो जीये , जितनी खामोशी से वो मुल्क से रुखसत हुए , जितनी ख़ामोशी से उन्होंने ये दुनिया छोड़ी , उतनी ही ख़ामोशी से 9 जून का दिन और उनके बिना दो साल भी निकल गए ..पता ही नहीं चला .
अपनी आखिरियत में उनके ना चाहते हुए भी मुल्क छोड़ने की मजबूरी , और इसी मजबूरी में जिन्दगी के आखिरी कुछ साल और आखिरी साल में वतन लौटने की तड़प लिए वो इस दुनिया से रुखसत हुए .
उन्हें मारा गया या वो खुद चल बसे ? ये सवाल इस धरती पर तब तक रहेगा जब तक फ़नकारो की कुंचीया रंगों से सराबोर रहेंगी . इंसानी माआशरे और तहजीब की इतनी तरक्की के बावजूद हुसैन साहब की इस तरह अपने वतन से दूर मौत हो जाना ये सवाल छोड़ता है की देशप्रेम के असली मायने क्या है ?? बीते हुए कल से मुद्दे खोज खोज कर निकलना , उन्हें मजहबी रंग देना और फिर उन मुद्दों को देशभक्ति से जोड़कर अवाम के बीच में उतार देना , इस मुल्क के हुक्मरानों का ये शगल हो चुका है .और उस पर अफसोस ये , की आज की पीढ़ी इस शगल को अपनाती है और फख्र के साथ माआशरे में और वर्चुअल दुनिया में अपने दिमागी दिवालियेपन का मुजायरा भी करती है.
चीजो को सतही तौर पर देखना और फिर सस्ते सवालों की बौछार करके बेसिर पैर के तर्कों से बहस जीतने के लिए बहस करना ,ये रिवाज इस मुल्क के युवा वर्ग के सर चढ़ के बोल रहा है आजकल . और इसी रिवाज के चलते हमें उस फ़नकार को खोना पड़ा जिसकी तूलिका पर खुद सरस्वती का वास था .



वो जिए तो अपने मुल्क के लिए , और इसी के लिए तड़प तड़प के मर भी गए . एक बार आशा भोंसले जी ने कहा था की जहा भगवान् भी पैर नहीं रखता वहाँ पर एक बेवक़ूफ़ पैर रख देता है . वो शायद कोई बेवक़ूफ़ ही होगा जो लता मंगेशकर की गायिकी में खामी निकाले , उन्होंने जो गा दिया वो फिजाओं में बिखर चुका है , उसमे कोई खामी नहीं है क्योंकि वो सरस्वती की आवाज है . इसी तरह हुसैन साहब के बारे में कहा जाता है की अगर वो एक बाल्टी में भर कर रंगों को दिवार पर फेंक मारे ,तो भी वो शक्ल तामीर हो जाती है जिसके लिए उनकी कला में मुरीद करोड़ो रुपये लुटा सकते है .और उनके मुरीदो और कला की समझ रखने वालो ने उन पर करोड़ो अरबो रुपये लुटाये भी , लेकिन वो हुसैन ही थे जिन्होंने कहा की अगर ये काम मुझे पैसो के लिए करना होता तो शायद मैं सड़क के किनारे आलू बेच लेता , क्योंकि मेरा रहन सहन और जरूरत के लिए सिर्फ उतना रुपया काफी है जो एक आम मजदूर दिन भर में कमाता है .
आखिर कब तक इस मुल्क के लोग बिना सोचे समझे बिना अपना दिमाग लगाए सियासतदानो के हाथो में खेलते रहेंगे . तीन सौ साल पुरानी इमारत को तोड़ने के लिए खून की नदिया बहा दी गयी, समाज में मज़हबी नफरत  का जहर घोल दिया गया ,बीस साल पुरानी बनायीं गयी हुसैन साहब की तस्वीरो को धार्मिक भावनाओं से जोड़ कर भोली भाली जनता को बेवक़ूफ़ बनाया गया . वो जनता जिसे ना ही कला की समझ है ना ही हमारे इतिहास की .

खजुराहो से लेकर कोणार्क तक और वेदों से लेकर "कुमार संभव" तक में लिखे धार्मिक देवी देवताओं की रतिक्रिया और सम्भोग के वर्णनों (तफ़्सरो ) से भरी पड़ी संस्कृति और उसके असल मायने समझे बिना हम उस कलाकार के पीछे पड़ गए और उसे अपनी धरती छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया । लेकिन वो हुसैन ही थे जिन्होंने अपने मुल्क को दिल में बसाया, मुल्क वापस लौटने की चाह में तड़प तड़प कर मर गए,  लेकिन कला की देवी सरस्वती की अराधना नहीं छोड़ी ,और जिस काम के लिये वो आये थे उसे करते रहे . शायद हुसैन ही भारत के उन चंद लोगो में से थे जिन्हें कला की समझ थी , शायद उन्होंने ही भारत की पुरातन कला को समझा और उसे अपने में उकेरा .और उसे ऐसा अपनाया की उसी के होकर रह गए . जब उन्होंने "सीता " पर अपनी सीरीज बनायी तो  सीता के त्याग से भरे व्यक्तित्व ने उन पर वो असर डाला की सीता की सरपरस्ती में उन्होंने हमेशा के लिए नंगे पैर रहना कबूल कर लिया.


हुसैन साहब पर फैसला सुनाने वाले, उनकी तामीरी तस्वीरो को बर्बाद करने वाले , उनकी सरस्वती के बनाये चित्रों को परखने वालो का क्या तालीमी इल्म था इस कला के बारे में ? हुसैन साहब ने अपनी माँ की तस्वीर या मोहम्मद साहब की तस्वीर बनायी या नहीं ये पूछने वाले किस अधिकार ये ऐसे सवाल कर रहे थे ? और अगर सवाल कर रहे थे तो क्या उन्होंने पहले वेदों को पुराणों  को खंगाल कर देखा की उनमे क्या भरा पडा है ? जिस धर्म में ब्रह्मा ने खुद अपनी बेटी को भोगा , जिस धर्म में इंद्र के किये की सजा अहल्या को मिली , जिस धर्म में सबसे बड़े भगवान् ने अपनी गर्भवती पत्नी को मरने के लिए छोड़ दिया .......क्या हुसैन से सवाल करने वाले लोग इन कथा पीड़ित और शोषित महिलाओं की जगह अपनी माँ बहन या बेटी को रख कर देख सकते है ??

क्या उन्होंने कभी कालिदास की रचना "कुमार संभव" पर सवाल उठाया जो हिन्दुओ के पांच सबसे बड़े संस्कृत की रचनाओं में माना जाता है ? वो कुमार संभव जिसका आठवाँ अध्याय ही पूरा शंकर और पार्वती के सम्भोग के वर्णन से भरा पडा है .
लेकिन हुसैन साहब का सरस्वती की तस्वीर बने का कारण ये सारे धार्मिक ग्रन्थ नहीं थे . वो उनकी कला क्षेत्र का वो बिंदु था जिसे वोही समझ सकता है जिसे उस कला की समझ हो .
हुसैन तो खुद सरस्वती के सबसे बड़े पुत्र थे जिन्होंने भारत के नाम का वो डंका बजाया की आज भी " आर्ट " की पढ़ाई के लिए स्कालरशिप पाकर लन्दन जाने वाले बच्चे "यूनिवर्सिटी ऑफ़ लन्दन आर्ट " में छाती फुला के इसलिए घुमते है की वो उस धरती से आये है जहाँ  हुसैन पैदा हुए थे . उन्हें ये कहते हुए कभी हिचक नहीं होती की "आई ऍम फ्रॉम इंडिया ".....क्योंकि उन्हें हमेशा ये जवाब मिलता है ..."ओह्ह ग्रेट ...इंडिया .."द लैंड ऑफ़ माक्बूल फिडा हुसैन "


हुसैन साहब का देश छोड़ने का फैसला और उनकी मौत असल में हमारी सड़ चुकी संवेदनाओं और फासिस्ट सियासत के असर में डूबी खोखली संस्कृति को दिखता है . और ये भी दिखता है की कैसे आज के पूंजीवादी समाज में जनता को बरगलाने के लिए मुद्दे बनाये जाते है और एक धर्म या जाती विशेष के लोगो को काल्पनिक दुशमन दिखा कर फासिसम का ज़हर फैलाया जाता है . ताकि जनता अपनी परेशानियों की वजह उस धर्म और जाती विशेष के लोगो को माने , ना की इस लूटखोर व्यवस्था के चलने वालो को .
खैर हुसैन साहब को जाना था वो चले गए लेकिन ये विश्वास है की आखिरियत में उनके दुखते दिल में सिर्फ उनका मुल्क  भारत ही रहा होगा . एक नब्बे साल का बुजुर्ग इस नफरत भरी दुनिया से कैसे लोहा लेता , इसलिए शायद उन्होंने मुल्क के प्यार को दिल में बसा कर कला की देवी की उपासना करना ही बेहतर समझा और दुनिया के एक दुसरे कोने में बैठ कर आखिरी वक़्त तक अपने काम को मुक़र्रर रखा जिसके लिए वो आये थे .
राजनीतिज्ञों के हाथो फासिस्ट विचारधारा के प्रभाव में बंधी अज्ञानी जनता की तरफ से हम हुसैन साहब से घुटनों के बल गिर कर माफ़ी मांगते है . हमारी तरफ से हुसैन साब को आंसुओ से भरी श्रधांजलि ...... इस फासिस्ट और शोषणकारी व्यवस्था से लड़ते रहने के निरंतर संकल्प के साथ उन्हें हमारा सलाम .

बस
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मंगलवार, 14 मई 2013

फिल्मे समाज का ..... धन लूटने का माध्यम होती है !


नशा शराब में होता तो नाचती बोतल ......पाकिस्तानी फ़नकार अजीज मियाँ के लिखे इस कलाम के मुखड़े को चोरी करके जब अमिताभ बच्चन की शराबी फिल्म में डाला गया उसके ऊपर अमिताभ के संवाद और उच्च वर्ग पूंजीपति की विक्षिप्त अवस्था को दिखाया तो शराब पीने वाली जमात को जैसे संजीवनी बूटी और अपने पीने को जायज ठहराने का वो कालजयी बहाना मिल गया , जो आज भी बदस्तूर जारी है और जिसे आज अनुराग कश्यप जैसे घुन्ने और तथाकथित भविष्य के फिल्मकार देव डी जैसी फिल्मे बना कर भुना रहे है.
वो जमाना गया जब फिल्मे समाज का दर्पण हुआ करती थी , आज फिल्मे समाज में रह रहे लोगो की मानसिकता (कमजोरी)  को समझ कर उनसे पैसा वसूलने का माध्यम बन चुकी है . आजकल के नौजवान आम बोलचाल की भाषा में औरतो के यौनांगो को लक्षित करके जो भाषा युस करते है , कई साल पहले मेरा एक लम्पट दोस्त कहा करता था की यार एक ऐसी फिलम बनानी चाहिए जो की हमारी भाषा (आम बोलचाल और गालियाँ ) में बने . और उनकी ये मुराद राम गोपाल वर्मा के चेले ने गंग्स और वास्सेय्पुर बनाकर कर पूरी कर डाली , एक नहीं दो दो डोज एकसाथ देकर .
आज के पूंजीवादी जमात के फिल्मकार समाज में ये मुद्दा खोजते है की लोगो को कुंठा निकालने में सबसे ज्यादा मजा किस बात में आता है , और फिर उसे ध्यान में रखकर दो महीने में पूरी फिल्म बना कर पूंजीवादी संस्कृति से प्रभावित लोगो की कुंठित मानसिकता को कुरेद कर उनसे पैसो उगाही शुरू कर देते है . "रागिनी का एम् एम् एस " "डेल्ही बेल्ही " और "गंग्स ऑफ़ वासेपुर " इस महान पूंजीवादी लूटपाट फिल्म संस्कृति की शुरुआत भर है . भौतिकवादी संस्कृति के प्रभाव और इस छदम फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध में फसी एक लड़की " मारिया सुसाईराज " और उसके प्रेमी द्वारा करी गयी वीभत्स घटना को एक फिल्मकार ने हाथो हाथ लिया और अपनी फिल्मांकन कला से घटना का सजीव और सचलचित्र  वर्णन करके एकतरफा प्यार और प्यार में धोखा खाए नौजवानों को इसी राह पर चलने की खामोश नसीहत दे डाली , दर्शको को लगने लगा की ये तो हर सोसाईंटी में होता है , मतलब ये एब्नार्मल नहीं है .जिन्हें ये लगता है की मैं नकारात्मक सोच के साथ लिख रहा हूँ वो एक साल में हुए ऐसे अपराधो के ग्राफ पर एक बार नजर डाल लें  .
इसके साथ साथ इस मुनाफेदारी व्यवस्था के तथाकथित विद्वान् ऐसे चित्रों में कला को खोज कर अखबारों के पन्ने रंगते भी दिखाई देते है. जैसे की एक भाड़े के लेखक लिखते है गंग्स ऑफ़ वासेपुर में "फैजल ने पूरी फिल्म में एक कुंठित युवा की भूमिका निभायी है जिसे ये पता होता है की उसकी माँ का किसी के साथ अवैध सम्बन्ध है "......वाह क्या परिद्रश्य चुना गया है कला और भावनाओं के प्रदर्शन के लिए . इस पैसा उगाही के साथ साथ ये संस्कृति सामंतवादी मूल्यों को फिल्मो के माध्यम से समाज में पूरी तरह बना कर रखती है . कला और यथार्थ के नाम पर पैसा वसूली का ये धंधा कुछ कलम घसीटो द्वारा जायज भी ठहराया जाता है . जहां मुंशी प्रेमचंद के साहित्य या महबूब खान के चलचित्रों में उनके चरित्र सामंती बन्धनों को तोड़ने की कोशिश करते दिखाई देते है वही आज "दिल्ली-6"  फिल्म में लडको को मर्द बनाने वाली के लिए एक जमादारनी को ही चुना जाता है .
बड़ी सफाई से अपनी (झूठी) सच्चाई को सामने रखने के लिए अनुराग कश्यप ने वासेपुर में एक संवाद भी डाल  दिया था , जब रामाधीर सिंह कहता है " इस देश में जब तक सलीमा बनता रहेगा ,,,,,,लोग बेवक़ूफ़ बनते रहेंगे "! लेकिन असल में वो अपनी तथाकथित कला के माध्यम से जनता की गाढ़ी कमाई की लूटने के बाद समाज को ठेंगा दिखा रहे थे ! शब्द कुछ यूँ होने चाहिए थे " " इस देश में जब तक सलीमा बनता रहेगा ,,,,,,लोग लुटते रहेंगे " !
क्योंकि नशे में कौन नहीं है मुझे बताओ ज़रा ...किसे है होश मेंरे सामने तो लाओ ज़रा !

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बस 

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

सामन्तवाद की खिचड़ी पूंजीवादी अचार के साथ.

                                            सामन्तवाद की खिचड़ी  पूंजीवादी  अचार के साथ.
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कल ही मेरे के दोस्त के बेटे का जनम दिन था , सन्डे   का दिन था तो उसें मुझे सबह सुबह बुला लिया और मुझे लेकर बाजार निकल पड़ा सामान लेने , मैंने पूछा की क्या सामान लाना है भाई .
उसने पहले पूजा का सामान ख़रीदा फिर एक केक और ये सब सामान घर पर रखने के बाद बोला "चल यार ठेके से बोतल ले आते है शाम के लिए ". तो सुबह सुबह पंडत जी आये ,पूजा हुई और शाम को केक काटा गया, जब बच्चे और घर की महिलाए रात में खाना खा रहे थे तो हम सारे दोस्त ऊपर छत पर आ गए और फिर दारूबाजी शुरू हो गयी।
सुबह को पूजा, और शाम को केक काट कर डांस करना , संस्कृति का ये घालमेल सीधे सीधे बाजारवाद और उपभोक्तावाद से जन्मा है , जहा पर लोगो को एक तरफ अपने को आगे दिखाने की होड़ के लिए  पूंजीवादी सभ्यता के लगभग हर गैर जरुरी उत्पादों को खरीद कर अपने आप को छदम सुख देता है और दूसरी तरफ भगवान् व पूजा के सारे कर्मकांड करके अपने तथाकथित पापो का संतुलन भी बनाए रखता है। येही कारण है की आज जीतनी भीड़ बाबाओ के समागमो में देखने को मिलती है , उतनी ही अनुपातित भीड़ आपको KFC , मक्डोनाल्ड और पिज्जा हट जैसी जगहों में भी मिल जायेगी।
उपभोक्ता वादी संस्कृती के चलते आज हमारे शादी ब्याह ,जन्मदिन ,मुंडन ,सारे अनुष्ठान  एक शो ऑफ कि चीज बन कर रेह गये है .लंबे लंबे खाने के मेनु, हर शादी मे चार-पांच फन्क्शन , हर फंक्शन के लिये अलग अलग कपडो कि तैयारीया। बेटी या बेटे के घरवाले अपनी तमाम मेहनत कि कमाई ओर कभी कभी तो उधार लेकर ये सब बे-जरुरती इंतेजामात करके समाज मे अपने दंभ को दर्शाते है कि देखो मेरे पास भी अच्छा खासा पैसा है, लेकीन कही अंतर्मन मे वो इस दिखावे को फिजूलखर्ची ओर अपना नुकसान भी मानता है . ओर अंततः ये कुंठा बाहर निकलती है घरेलू तनाव ओर बाद मे पत्नी ओर बच्चो के साथ कलह मे .
असल में ये हमारा भारतीय समाज एक बच्चा है जी। ये समाज एक त्रिशंकु अवस्था में झूल रहा है।
इसकी हालत एक बच्चे जैसी है , वो बच्चा जिसे कोई एक झुनझुना लाकर देदे तो वो उसे बजाने लगता है , फिर एक गाडी दे दे तो वो उसपर मस्त होकर चलने लगता है, और फिर जब और बच्चे मिलते है तो वो उन्हें अपने खिलौने दिखाने के लिए रोमांचित हो जाता है।
हमर समाज भी कुछ ऐसा ही है, हमें लगता है की हम प्रगति कर रहे है ,लेकिन बिना सोचे समझे की ये वाकई प्रगति है या कुछ और .
जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना धंधा सँभालने के लिए सस्ते कामगारों की जरुरत पड़ी तो हमें MBA और बिजनेस स्कूल खुलवा दिए और झुनझुना पकड़ा दिया , जब उन्हें व्यापार बढाने के लिए संचार तंत्र की जरुरत पड़ी तो इन्टरनेट और मोबाइल का झुझुना पकड़ा दिया , ,,,,और अब वो खिलौने बेकार हो गए तो उनका उपयोग बता कर वो अभी भी ये हमें बेचे जा रहे है। इस धरती पर मानव समाज के विकास का हर जगह अलग अलग अवस्थाओं में सामान विकास हुआ है , इंगलैंड वो पहला देश था जहा मशीनी सभ्यता सबसे पहले पनपी और अपनाई गयी , जब मशीन आई तो उसके चलाने वाले और मालिको के दिमाग भी इससे अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की जुगत में लग गए , इसी के तहत उन्होंने सबसे पहले अन्य देशो में मशीनी सभ्यता के विकास की प्रारंभिक अवस्था में ही भ्रूण हत्या करनी शुरू कर दी और उन्हें अपना औपनिवेश घर बना कर वहा  का कच्चा माल लूटना शुरू कर दिया। भारत में भी अंग्रेजो के आने के शुरूआती दिनों में बंगाल में जूट उद्योग लगने शुरू हो गए थे जिसे इन्होने बर्बाद कर दिया।
इसी प्रकार पश्चिम के जिन जिन देशो में औध्गिक सभ्यता विकसित हुई उन्होंने ज्यादा से ज्यादा उपनिवेश हड़पने की कोशिश करनी शुरू कर दी , और इसकी परिणिति आखिर में विश्व युद्ध पर जाकर ख़तम हुइ.
आज के समय में माहौल कुछ ऐसा बना दिया गया है की लोग मोबाइल, मॉल कल्चर ,इन्टरनेट और कंप्यूटर को ही प्रगति का पैमाना मानने लगे है , इस बीच अगर आप गेंहू ,चावल और दाल उगाने वाले किसानो की बात करो तो इसे कोई तवज्जो नहीं देते।   लेकिन सोचना ये चाहिए की इन सब चीजो का इस्तेमाल करते हुए भी जब आप हर एक या दो घंटे में कुछ खाने के लिए खोजते हो तो वो खाने की चीज गेंहू ,चावल या किसी अन्न से ही बनी होती है जिसे हमारे किसान पैदा करते है , चाहे आप KFC में खाए या हल्दीराम के आउटलेट में , आप किसान की मेहनत का ही खाते है ...इन्टरनेट आपकी भूख नहीं मिटा सकता . आज भी माल बेचने के लिए पूंजीवाद एक नहीं दो नहीं बल्कि हर दिशा से हमला करके आपको माल खरीदने के लिए मजबूर करता है ,ये कडिया कैसे आपस में जुड़ी  हुई है ...आइये इसका एक नमूना देखते है .
टीवी और सिनेमा के माध्यम से गंदी फिल्मे और सीरियल से नौजवानों में ये भाव पनपा है की आज के युग में गर्ल फ्रेंड या बॉय फ्रेंड का होना जरूरी है .
अब जब प्रेमी या प्रेमिका होगी तो आपको बहार डेटिंग भी जानना पड़ेगा ,,,तो इसके लिए मॉल और मार्केट खुले पड़े है .
अब मॉल और मार्किट से सामान भी खरीदना पड़ेगा एक दुसरे को गिफ्ट देने के लिए,,,,,तो इसके लिए लवर्स डे , किस डे , चोकलेट डे और ना जाने क्या क्या डे बनाए गए .
अब इस संस्कृति को क्या कहा जाए जो की सिर्फ माल बेचने के लिए कृत्रिम रूप से बनायी गयी है . ये संस्क्रती जो की अभी आपको माल खरीदने के लिए नए नए भगवान् भी दे देती है, क्रिकेट के भगवान् , सिनेमा के भगवान् वैगैहरा वैगैहरा,   ताकि आप उनके द्वारा विज्ञापित सामानों को ख़रीदे और इसी संस्कृति का विभत्स रूप आपको पश्चिमी दुनिया के कई देशो में मिल जायेगा जो की अपने युद्ध सामग्री और हथियार बेचने के लिए अंधराष्ट्रभक्ति तक विज्ञापन के रूप में दिखाते है .
फिलहाल हमारे त्रिशंकू समाज के खिचड़ी संस्कार तब तक ऐसे ही चलते रहेंगे जब तक इन्हें रचने वालो का समूल नाश ना होगा / या किया जाएगा .
ओह्ह बताना भूल गया ...मेरा जिगरी दोस्त अश्मित आज सुबह सुबह मदिर गया था , मत्था टेकने  , एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में इंटरव्यू अटेण्ड करने के लिए . अभी अभी उसका  फ़ोन आया है की उसके सारे इंटरव्यू राउंड क्लियर हो गए और अगले महीने जॉइनिंग है। ....उसने आज शाम बियर पार्टी के लिए बुलाया है .

बब्बाय .....एन्जॉय कैपिटलिज्म ...

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

सॉरी श्री राम .... I am not convinced

सामंतवादी चरित्रों का पूजन पूरी तरह जातीय दंभ और शाशक वर्ग की सत्ता बनाए रखें के लिए समाज को सुनाता जाता रहा है .
ये वाकई अद्भुत और विचार करने योग्य प्रशन है की आज तक कोई भी भगवान् वर्ण व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर घोषित समाज के घर पैदा क्यों नहीं हुआ ?
ये सभी चरित्र या तो ब्राह्मण या फिर ठाकुर परिवारों में ही पैदा हुए. श्री राम ,परशुराम ,कृष्ण, बलराम ,और सभी काल्पनिक चरित्र पूरी तरह या तो शाशक वर्ग में पैदा हुए और उनके साथ खड़े नजर आते है या फिर उनका साथ देते हुए तथाकतित धर्म युद्ध लड़ने के नाम पर विद्रोह को दबाने के लिए लड़ते है । राम , परशुराम और कृष्ण द्वारा किये गए सारे कृत्य इधर उधर से लीपा पोती वालो तथ्यों और तर्कों द्वारा धार्मिक घोषित किये जाते रहे है . बाली का वध हो या शम्बूक की ह्त्या , महाभारत का युद्ध हो या परशुराम का नरसंहार , हिन्दुओ की तथाकथित उच्च जातियाँ येन केन प्रकारेण इन सभी कृत्यों को धर्म रक्षा के लिए बताती है .
जब प्रणय निवेदन कर रही स्त्री स्वर्णनखा की नाक काट देते है और दोंनो भाई मिल कर उससे चुहलबाजी करते है तब ना जाने वो कौन से धर्म का पालन कर रहे होते है , और खुद रामायण में सैकड़ो बार "महाज्ञानी " " महात्मा"  "महा विद्वान् " जैसे शब्दों से अलंकृत रावण की बात आती है तो वो अधर्मी और पापी घोषित किया जाता है. जबकि राम कथा से जुड़े सारे ग्रंथो में ये लिखित रूप से मौजूद है की रावन ने कभी सीता पर बल प्रयोग नहीं किया (अपहरण को छोड़ कर ) और हमेशा उससे मिलने जाते हुए अपने पूरे परिवार और धर्मपत्नी मंदोदरी के साथ ही गया.  सीता माता और स्त्री पात्रों के साथ उसके व्यवहार को इतना उत्तम दिखाया गया है कि कथा के नायक श्री रामचंद्र जी का क़द भी उसके सामने छोटा पड़ जाता है । क्षत्रिय कभी भागते हुए शत्रु को नहीं मारता तो फिर भी बाली वध को ना जाने किस द्रष्टि से धार्मिक ठहराया जाता है ?महाराज बाली का तो वो प्रताप था की रावन जैसे को भी अपनी बगल में दबा के सिक्स मंथ तक घुमते रहे, और बोले बेटे रावण तू तो चीज क्या है ,और राम ने महाराज बाली को एक बठला हाउस स्टाइल में एक फर्जी मुठभेड़ में धोखे से मारा, रामभक्त बाली के दुसरे की शक्ति को खींच लेने के वरदान के कारण राम का ये कृत्य सही ठहराते है, तो कुछ पढ़े लिखे अंध भक्त ये कहते है की बाली ने अपने छोटे भाई का राज्य और पत्नी छीन कर अधर्म किया था .क्या श्री राम उसके इस अधर्म के लिए उसे सामने से ललकार कर सजा नहीं दे सकते थे,??? या उन्हें डर था की कही बाली उनका ही शिरेच्छेद ना कर डाले ? फिलहाल बाली को मारने के बाद उन्होंने सुग्रीव की पत्नी रोमा की अग्नि परीक्षा क्यों नहीं करवाई ,जबकि रोमा तो बाली के साथ मजबुरी वश लेकिन स्वेच्छा से रही थी उसके भरष्ट होने की ज्यादा सम्भावना थी,
और अगर नही करवाई अग्नी परीक्षा तो फिर सीता के लिए अलग कोड ऑफ़ कंडक्ट क्यों अपनाया गया ??? इसलिए सारी बात कि एक बात काल्पनिक उपन्यास में जो मर्जी भये वो लिख दो, सदियो कि मानसिक गुलामी वाले लोग भरे पडे किसी भी काल्पनिक कहानी पर विश्वास करने के लिए .......आखिर एकता कपूर ऐवैइ थोड़े पीट रही है पैसा काल्पनिक कहानिया दिखा दिखा कर।
आग में गुज़रने की परीक्षा औरत से कोई बुद्धिजीवी नहीं लेता और झूठे आरोप पर कोई पति और राजा अपनी पत्नी और अपने नागरिक के मानवाधिकारों का हनन नहीं करता और गर्भावस्था में तो आज का पतित समाज भी किसी बुरी औरत तक के साथ बदसुलूकी की इजाज़त नहीं देता । तब मर्यादा की स्थापना के लिए जन्मे सदाचारी श्री रामचंद्र जी एक सती के साथ उसकी इच्छा और न्याय के विपरीत उसका त्याग क्यों कर दिया जबकि खुद उनके भाई लछमन और बाकी घरवाले रोकते ही रह गए।
इस काल्पनिक कथा में दलितों और समाज की निम्न वर्ग को भी बस राम के सेवक के रूप में ही दिखाया गया,,,,,चाहे वो शबरी प्रकरण हो या केवट की कथा , या फिर खुद वाल्मीकि का चरित्र भी उनकी कपोल कल्पित प्रशंशा में ही लगा रहा .
युद्ध का मतलब ही होता है हिंसा , मारकाट, हजारो विधवाए इस तरफ हुई और हजारो विधवाए उस तरफ हुई, निर्दोष लोगो की ह्त्या और दुर्दांत आर्थिक और सामाजिक संकट . और एक अवतार के लिए ये भी सब धर्म युध्ह घोषित कर दिया गया.  अंततः सारे धार्मिक ग्रंथो की तरह ये काल्पनिक कथा भी शाशक वर्ग के महिमामंडन से भरी हुई है जिसमे नैतिक और अनैतिक कामो का  चरित्रों के हिसाब से और वर्ण व्यवस्था के प्रतिनिधित्व करते चरित्रों को ध्यान में रख कर अर्थ निकाले गए है .

गलती मर्यादा पुरषोत्तम राम की नहीं है ...गलती या कहे षड्यंत्र तो उन शोषण कारी शक्तियों का है जो आज भी इन सामंती गपोड़ ग्रंथो को प्रासंगिक बता कर अशिक्षा , अंधभक्ति और शोषण आधारित सामाजिक और जातीय ढांचे को बनाये रखना चाहते है ......ताकि इन्हें अपनी सुविधानुसार हर अनैतिक काम को सही ठहराने के लिए आधार मिलता रहे .