मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

"मार्क्सवाद" और भारत में जाती व्यवस्था

फेसबुक पर हमारे एक मित्र "प्रचंड नाग जी" ने अपने कुछ सवालात रखे,  विषय था की ""मार्क्सवाद के अनुसार भारत में जाती व्यवस्था से उत्पन्न शोषण के लिए क्या समाधान हो सकता है"
मैंने उनके सवालों का अपने अनुसार जवाब देने की कोशिश करी और ये सम्पूर्ण बहस एक लेख के रूप में संकलित कर दिया ,जिससे अन्य  साथियों की प्रतिक्रया भी जान सकू।





प्रचंड नाग जी  --
भारत में ब्राह्मण पूंजीपति नहीं थे लेकिन शोषण था व अब भी है । शूद्र-अतिशूद्र को अपने मनपसंद व्यवसाय करने से भी रोका जाता है । इस व्यवस्था को उखाड़ने के बारे में मार्क्स क्या कहते हैं

***********************************************
  • उत्तर -
    आप ये जानते ही होंगे की किसी भी व्यवस्था में शोषण करने के लिए शाशक वर्ग सिर्फ बल प्रयोग से ही व्यवस्था को टिकाये नहीं रख सकता,,उसके लिए जनता को जात धरम और क्षेत्र के नाम से बाटना और समाज में जनता के बीच वर्गों का होना जरुरी होता है, और ये वर्ग आर्थिक , जात और धरम के नाम पर पैदा किये जाते है।
    सबसे पहले तो ये जानिए की भारत में पूँजी वाद कभी सही से डेवलप हो ही नहीं पाया ! आज भारतीय समाज एक अर्ध सामंती अर्ध पूंजीवादी देश है, मतलब की इसके पारंपरिक ढांचा तो सामन्ती है और आधौगिक विकास विदेशी पूँजी के माध्यम से हुआ है , लेकिन पिछले कुछ सालो में अब खुद देशी पूंजीपति भी बहुत मजबूत हुए है .
    ब्राह्मणों द्वारा या तथाकथित उन्ची जातियों द्वारा निचले तबके के लोगो का शोषण एक सामंती लक्षण है,,,मतलब की राजे महाराजे और जमींदारों वाला सिस्टम , कुछ यूँ समझिये की गरीबो या तथा कथित निचली जातियों के शोषण का चक्र हजारो साल पहले हुआ था , जिसमे उस समय भी सत्ता पर काबिज लोग जनता का शोषण करने के लिए बल प्रयोग के साथ साथ उन्हें सांस्क्रतिक रूप से भी दिमागी रूप से गुलाम बना कर रखते थे,,

  • 1- जैसे की 84 हजार योनियो वाला सिद्धांत
    2- कर्म करो फल की इच्छा मत करो वाला सिद्धांत
    3- राजा पिता सामान है, प्रजा को राजा की सेवा करनी चाहिए आदि आदि ..

  • जनता में वर्ण व्यवस्था को धर्मग्रंथो के माध्यम से जायज ठहराया गया , और फिर पूर्व्जनाम की थिओरि जनता को समझाई जाती थी, जिससे की लोग दिमागी रूप से गुलाम हो जाते थे और चुपचाप शोषण का शिकार होते रहते थे,की कंही अगले जनम में पशु योनि में ना चले जाये ,और इन सब बातो को जनता में पहुचाने और थोपने का जिम्मा ब्राह्मण बिरादरी को दिया गया ! जिसके तहत  तमाम
    धर्मग्रन्थ लिखे गए जिनका मुख्य सन्देश ये था की , आपके सुख दुःख को नियंत्रण करने वाला भगवान् है और आपका काम है की चुप चाप राजा (शाशक ) वर्ग की सेवा करो .अब अगर कोई शोषित वर्ग या शुद्र ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करता था तो उसका बलात हनन कर दिया जाता था,
    रामायण में शम्बूक और महाभारत में एकलव्य इसी विद्रोह को दबाने के उद्दरहण के रूप में समझे जा सकते है .लेकिन जो लोग शाशक वर्ग के लिए खतरा नहीं होते थे उन्हें अपने ग्रंथो में प्रशंषित किया जाता था. शबरी और केवट का उद्दरहण आपके सामने है जिसके द्वारा ये संदेश देने की कोशिश की गयी की राजा के प्रति भक्ति भाव रखो और ज्ञान प्राप्त करने या विद्रोह करने की मत सोचो, क्योंकि उन्ही की सेवा करके आप 84 हजार योनियो के चक्कर से बच सकते हो आदि आदि .
    तो ब्राह्मण जाती और तमाम और साधन इस व्यवस्था को टिकाये रखने के टूल के रूप में काम करते थे . जो की बाद में और विभत्स होता गया,,,परन्तु व्यवस्था के मूल में भी वोही भाव था,. की उत्पादन के साधनों (व्यापार, खेती, उद्योग धंधो ) पर शशक वर्ग का कब्जा रहे और जनता का शोषण चलता रहे और जनता में सभी शामिल थे शूद्र , माध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर हर जाती के लोग .और इनके बीच भी वोही सड़े हुए सामन्ती संस्कार और अंतर ज़िंदा रहे (जात पात आदि ) ,क्योंकि व्यवस्था में सबसे ऊपर सता पक्ष के लोगो का भाव शोषण करने का था,,ना की जनता की सेवा का,,इसी लिए ये अंतर बनाए रखे गए शोषण को जारी रखने के लिए .
    सार के रूप में बस ये जानिये की शोषक वर्ग का एकमात्र लक्ष्य अपना मुनाफा बढ़ाना और शोषण करना होता है ,
  • प्रचंड नाग जी  --  निजी मुनाफे से रहित समाज कब परिपक्व हो जाता है ? कितना समय लगता है ? कोई उदाहरण ?***********************************************
    उत्तर -
    ये इस बात पर निर्भर करता है की मजदूरों की पार्टी कितनी मजबूत है .मतलब अगर उसका सत्ता ( न्यायालय + नौकर शाही + फ़ौज पुलिस ) पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए और ये तब हो सकता है जब उत्पादन के साधनों ( उद्योग,खेती, खानों , बैंक , सूचना प्रसारण और अन्य प्रमुख संस्थान ) पर जनता का कब्जा होना चाहिए .
    जब स्टेट मशीनरी और सत्ता ये सुनिश्चित कर लेती है तब समाज का आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक सकारात्मक विकास होता है और सारे सड़े हुए सामन्ती बंधन टूट जाते है और वर्गों का आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर मिट जाता है .
    इसमें समय के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता इसमें 50-100 या 200 साल भी लग सकते है ,क्योंकि जो पार्टी निजी मुनाफे पर आधारित व्यवस्था को बर्बाद करेगी तो पूंजीपति वर्ग उसे दोबारा वापस पाने के लिए हर कदम उठाएगा ,और ये संघर्ष निश्चित रूप से हिंसक होगा।यहाँ पर मजदूरो की मशीनरी (फ़ौज +पुलिस) पूंजीपति वर्ग का विनाश सुनिश्चित करेगी ,मतलब मजदूरो की तानाशाही की जरुरत पड़ेगी,
    उद्दरहण के रूप में आप रूस और चीन की क्रांति के बारे में पढ़ सकते है ,,जिसमे उन्होंने 50-100 सालो तक जनयुद्ध चला कर मजदूरो की सत्ता की स्थापना करी और उतपादन के साधनों का राष्ट्रीयकरन कर दिया .जिससे समाज में जाट पात और धरम के अंतर खुद बा खुद मिटने शुरू हो गए थे .

    (रूस और चीन के टूटने की वजह एक अलग विषय है,,,,,आप चाह्हे तो इस पर अलग से डिस्कस कर सकते है )
    **************************************************

  • प्रचंड नाग जी  --(1) लोगों की गरीबी नष्ट होने से क्या कोई जाति-धर्म त्याग देता है ?
    (2) मजदूरों के शोषण को उत्पादन के साधनों पर कब्जा करके खत्म किया जा सकता है । जाति के आधार शोषण को उत्पादन के साधनों पर कब्जा करके कैसे नष्ट किया जा सकता है ?
    (3) केन्सर के बेक्टीरिया को खत्म करने वाली दवाई से क्या टीबी का बेक्टीरिया खत्म किया जा सकता है ?
    ************************************************
    उत्तर -
    ये आपके सवाल सामन्ती संस्कारों को ध्यान में रखते हुए किये गए है .आप उस समाज की कल्पना करिए की जहा पर एक सीवर लाइन साफ़ करने वाले मजदूर और फक्ट्री में एक मनेजर की आमदनी में कोई ख़ास फरक नहीं होगा,,,दोनों को बुढापे में पेन्सन मिलेगी, बच्चो की सिक्षा और उनके भविष्य के रोजगार की जिम्मेदारी सरकार की होगी, सभी स्कूल सामान होंगे, सभी अस्पताल सामान होंगे,और इलाज लगभग मुफ्त होगा।
    ऐसे समाज में किसकी क्या जाती है किसी को कोई मतलब नहीं होगा और अगर कोई तथाकथित रूप से भंगी जाती का है तो भी वो किसी की कोई परवाह अहि करेगा,,,,क्योंकि उसके बच्चे भी उसी स्कूल में पढेंगे जहा एक ब्राह्मण के, वो भी वंही  इलाज करवाएगा जहा एक तथाकथित सवर्ण  जाती का इंसान इलाज करवायेगा।
    और जाती एक व्यक्तिगत मसला होगा, लेकिन फिर भी अगर कोई जात के आधार पर भेद करने को कोशिश करेगा तो उसके लिए कानून होंगे .इसे कोई यूटोपियन सिद्धांत मत समझिएगा ये एक प्रयोग हो चुकी व्यवस्था है . और एक दो नहीं पूरे 80 साल तक ये चला था .
    ( ये फिर क्यों टूट गया ---ये अलग बहस का विषय है ,,,आप चाहे तो इस विषय पर भी बात हो सकती है )

  • प्रचंड नाग जी  --  केन्सर के बेक्टीरिया को खत्म करने वाली दवाई से क्या टीबी का बेक्टीरिया खत्म किया जा सकता है ?
    *-***************************************
  • उत्तर -मार्क्सवाद ने अनुसार यहाँ पर कोशिश ये होनी चाहिए  कीऐसा माहौल हो की जिसमे किसी भी प्रकार के बैक्टीरिया पैदा ही नहीं होगा , क्योंकि सभी बीमारियों के बैक्टीरिया गन्दगी में पैदा होते है . और वो गन्दगी है पूंजीवादी सिस्टम जो की सिर्फ मुनाफ़ा कमाने और शोषण पर आधारित होता है  जब ये गन्दगी ख़तम हो जायेगी तो बैक्टीरिया भी अपने आप ख़तम हो जायेंगे ,,और बैक्टीरिया पैदा करने वालो को भी क्रांतिकारी ताकतों के द्वारा ख़तम कर दिया जाएगा
  • प्रचंड नाग जी  --  मजदूरों की सत्ता कैसे चुनी जाएगी ? मजदूरों की पार्टी कौन सी होगी यह कौन निर्धारित करेगा ? वे कौन होंगे जो पूंजीवादी व्यवस्था से बचाएंगे ?************************************************
  • उत्तर -
    आपके इस सवाल का जवाब शायद इस लेख में मिल जाए . पहले स्पष्ट करना चाहूँगा की मैं नक्सलियों की हिंसा का समर्थन नहीं करता लेकिन ये लेख उनके सिद्धांत को समझने की कोशिश मात्र है
    http://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200221202949931&set=o.487351021298933&type=1&theater

3 टिप्‍पणियां:

  1. मार्क्स वाद में शक्ति का चयन कौन करेगा और कौन ये तय करेगा कि क्या क्या कैसा कैसा हो.......क्या संख्या बल यहाँ भी काम करेगा ?

    उत्तर देंहटाएं
  2. अजय भाई - सबसे पहले धन्यवाद की आपने इस लेख को पढ़ा टिपण्णी दी और ब्लॉग में आये ....

    मार्क्सवाद मात्र सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत है , मार्क्सवाद में जनता ही मुख्य परिवर्तन करी शक्ति होती है .
    आपका सवाल शायद भारत के सन्दर्भ में है की ""मार्क्स वाद में शक्ति का चयन कौन करेगा और कौन ये तय करेगा कि क्या क्या कैसा कैसा हो.......क्या संख्या बल यहाँ भी काम करेगा ?""

    मार्क्स के सिद्धांतो पर आधारित क्रांति और क्रांतिकारी पार्टी ही ये तय करती की साम्यवादी समाज में उत्पादन व्यवस्था और उसका वितरण कैसा होगा . ये स्पस्ट है की मार्क्सवादी पार्टी के ढांचे में "राईट टू रिकाल " की वजह से भ्रस्ताचार की सम्भावना ख़तम हो जाती है ( आप इसका सीपीआई और सीपीएम से तुलना मत कीजियेगा ..वो कम्यूनिस्टो के भेष में शंशोध्न्वादी लोग है )
    अगर आप इसे निजी मुनाफे रहित व्यवस्था की स्थापना की प्रक्रिया से जोड़ रहे है तो संख्या बल यहाँ भी काम करेगा. क्योंकि साम्यवाद या समाजवाद का मुख्य अंग जनता होती है , सारी व्यवस्था जनता के लिए जनता के द्वारा बनायीं जाती है . पूंजीवादी समाज की तरह नहीं की मुकेश अम्बानी के पी एम् ओफ्फिस फोन किया और अपना टेंडर पास करवा लिया .....शायद आप समझ रहे होंगे .
    फिलहाल आप मुझे फेसबुक में "Vishvnath Dobhal" नाम से खोज कर ऐड कर लीजिये ...हम लोग वह काफी चर्चा करते रहते है ......थोडा आसान हो जाता है संवाद करना .

    धन्यवाद अजय भाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप यदि हिंदू है तो आपके विचार गलत है,,,, यदि नही तो बिलकुल सही

    उत्तर देंहटाएं