सोमवार, 17 दिसंबर 2012

विचारधारा की विफलता - या विचारधारा की अज्ञानता ????



फेसबुक पर हमारे एक मित्र दिनेश जी ने कम्युनिस्म के बारे में अपने कुछ विचार रखे .......
मेरे अल्पज्ञान के चलते जितना भी हो सका मैंने उन्हें जवाब देने की कोशिश करी है,,,,,,,इसी पूरी पोस्ट को मैं यहाँ एक लेख के रूप में रख रहा हूँ .

दिनेश जी ने अपने विचार कुछ इस तरह रखे -

कमुनिस्ट विचारधारा की विफलता :-
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जिस जिस देश में कम्युनिस्ट रहा और है उस देश के मजदुर वर्ग का जीवन बद से बत्तर होती चली गई.. रूस / चाइना/वेनेजुएला /भारत(बंगाल / केरल) किसी भी देश / राज्य में कम्युनिस्ट के साशन में सबसे जायदा शोषित वर्ग मजदुर ही रहा, उनको हमेशा अपने हक के लिए संगर्ष करना पड़ा परन्तु किसी भी कम्युनिस्ट नेता ने उनके हालात को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया.. नतीजन पूंजीवाद का पलायन या कम्युनिस्ट विचारधारा को त्याग कर पूंजीवाद के शरण में जाना..आज रूस/चाइना एक पूंजीवाद देश के रूप में उभर रहे हैं.. यह वोही देश हैं जहां लेनिन / माओ के विचार ने देश के अधिकांश लोगो को शोषित होने पर मजबूर कर दिया .पूंजीवादी देशों मे मज़दूरों को संगठन बनाने और हड़ताल का अस्त्र प्राप्त था और है भी.मज़दूरों का यह अधिकार कम्युनिस्ट देशों में तुरन्त समाप्त किया गया. अपनी सुविधाओं औ
र वेतन में वृद्धि के लिए पूंजीवादी देशों में मज़दूरों का हड़ताल पर जाना एक आम बात है, लेकिन कम्युनिस्ट देशों में मज़दूर ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता.जब अमेरिका ने मास्को में अमेरीकी मज़दूरों के जीवन पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया तो रूस के मजदूर आश्चर्यचकित रह गए ,जब उन्होंने देखा कि उनकी तुलना में अमेरिका के मज़दूरों को न केवल सुख-सुविधाएं ही अधिक हैं, उनका जीवन-स्तर भी ऊंचा है . आज भारत में कम्युनिस्ट का नया रूप माओवाद ने ले लिया, कम्युनिस्ट आज भी मार्क्स / एन्ग्लेस / लेनिन के विचारधारा को समझने में नाकाम.. वोह अपने बच्चे/पत्नी के साथ एक ही छत के नीचे रहते हैं...ओर कई कम्युनिस्ट मंदिर/गिरजाघर का चक्कर आये दिन सुबह शाम लगाते हैं.. आज देल्ही में शिला दीक्षित ने ६०० रूपए मासिक आय तय किया ५ जनों के परिवार के लिए. क्या कम्युनिस्ट कभी ६०० रूपए में गुजरा कर पायेगा ?? उनको कितना मासिक आय तय करना चाहिये ५ जनों के परिवारों के लिए ??? कहाँ गया कम्युनिस्ट भारत में ??? कहीं नज़र आये तो जरूर बताइयेगा , एक बार देखना चाहूँगा की वोह दिखने में कैसे होते हैं :)
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दिनेश जी मुझे पता है की आपने ये पूरा लेख और "फिल्म" वाला प्रकरण "विपिन कुमार सिन्हा "के ब्लॉग से कोपी किया है , जो की प्रवक्ता. कॉम में लिखते रहे है....... ..बनिस्बत इसके की उन्हें मार्क्सवाद की कोई समझ ही नहीं है फिर भी वो भोली भली जनता को बरगलाने के लिए कई सालो से कम्युनिस्म के खिलाफ लिखते रहे है ,,,,,,इसमें कोई नयी बात नहीं है.
लेकिन फिर भी आपको शुक्रिया की आपने इसे यहाँ पोस्ट किया ,,,,,,,क्योंकि इसका जवाब देना बहुत जरुरी है,,,,,,,तो मैं एक साथ न लिख कर आपकी पोस्ट की एक एक लाइन का बारी बारी जवाब देना चाहूँगा 
1 - दिनेश त्रिपाठी जी .... आपने कहा -
"जिस जिस देश में कम्युनिस्ट रहा और है उस देश के मजदुर वर्ग का जीवन बद से बत्तर होती चली गई.. रूस / चाइना/वेनेजुएला /भारत(बंगाल / केरल) किसी भी देश / राज्य में कम्युनिस्ट के साशन में सबसे जायदा शोषित वर्ग मजदुर ही रहा, उनको हमेशा अपने हक के लिए संगर्ष करना पड़ा परन्तु किसी भी कम्युनिस्ट नेता ने उनके हालात को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया.. ..."************************************************
सबसे पहली बात ये मानव समाज के बदलने के या एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने के कुछ नियम होते है,,,इन नियमो को मार्क्स ने बताया था जिस वजह से इनका नाम मार्क्सवाद पड़ा,
कहने का मतलब ये है की मार्क्सवाद एक विज्ञान है जिसके द्वारा हम मानव समाज के परिवर्तित  होते रहने के नियमो को समझ कर उसे सुधार सकते है, ठीक उसी प्रकार जैसे की "हमें पता है की पानी गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर बहता है,,,तो हम उसे रोक कर डैम बनाकर बिजली का उत्पादन करते है।......तो जबकि ये विज्ञान है और जब आप किसी विज्ञान के सिद्धांतो के आधार पर कोई प्रयोग करते है तो उसमे आप कभी सफल होते हो,,और कही असफल और कभी आंशिक रूप से आपको सफलता मिलती है। इस स्थिथि में आप विज्ञान के नियमो को दोष नहीं ,,दे सकते,,बल्कि आपका प्रयोग का गलत तरीका आपको असफलता दिलाता है।
इसीलिए अगर चीन में या रूस में समाजवाद / कम्युनिस्म विफल होता है तो इस हार की  जिम्मेदारी वह के कम्यूनिस्टो की है,,,, पर  "ये कम्युनिस्म विचारधारा या मार्क्स के सिद्धांतो की हार नहीं है"

तो आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ की ...."किसी भी कम्युनिस्ट नेता ने उनके हालात को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया"...
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2 - दिनेश त्रिपाठी जी.....आपने कहा -
"'नतीजन पूंजीवाद का पलायन या कम्युनिस्ट विचारधारा को त्याग कर पूंजीवाद के शरण में जाना..आज रूस/चाइना एक पूंजीवाद देश के रूप में उभर रहे हैं.. यह वोही देश हैं जहां लेनिन / माओ के विचार ने देश के अधिकांश लोगो को शोषित होने पर मजबूर कर दिया.""
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यहाँ पर ऐसा कुछ भी नहीं है की किसी को किसी सिस्टम की शरण में जाना पड़ा,,,,,,,,,,अगर आपने मार्क्सवाद का Historical Materialism पढ़ा  हो तो शायद आप ये समझ पायेंगे की मार्क्स ने मानव समाज की   "एतिहासिक द्वंदवाद या Dialectical Materialism" के हिसाब से व्याख्यया की है, ,,इसके अनुसार मानव समाज में जो भी व्यवस्था ज्यादा ताकतवर होती है वो दूसरी व्यवस्था पर हावी हो जाती है,,,,ठीक इसी तरह जैसे की हमारे शरीर में जब तक पॉजिटिव सेल ज्यादा एक्टिव या जिन्दा रहते है ,,तब तक हमारा शरीर भी जिन्दा रहता है,,,और जब नकारात्मक रेजिस्टेंट पावेर हावी हो जाती है तो हम मर जाते है,,,या बीमार हो जाते है। आज रूस या चीन में अगर वहा की सरकार या कुछ विशेष पूंजीवादी गुट आज ताकतवर हो गए है तो इसका सिर्फ एक मतलब है की वह पर कम्युनिस्म को लागू करने वाली शक्तिया कमजोर हुई है /या हो गयी थी /या उन्होंने गलतिया करी थी।,,जिस वजह से पूंजीवादी उत्पादन सिस्टम दोबारा से ताकतवर बन कर उभर कर वापस आ गया।,,जिस दिन क्रांतिकारी शक्तिया उनसे ताकतवर हो जायेंगी ,,वो पूंजीवाद को दोबारा उखाड़ फेकेंगी,,,और ऐसा होकर ही रहेगा,,,,,क्योंकि ये भी मार्क्सवाद का ही नियम है जैसे की मानव समाज ने कबीलाई अवस्था को पार करके सामंत वादी/ राजशाही  स्टेज में प्रवेश किया और फिर पूंजीवाद ने सामंतवाद या राजशाही  को उखाड़ कर फेक दिया था,,,,,,,इसी प्रकार पूंजीवाद से अगली स्टेज समाजवाद है जिसका आना पक्का है,,,,आज या कल ,,,या फिर 50-100,, या 150 साल बाद।
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3 - दिनेश त्रिपाठी जी आपने कहा -
""पूंजीवादी देशों मे मज़दूरों को संगठन बनाने और हड़ताल का अस्त्र प्राप्त था और है भी.मज़दूरों का यह अधिकार कम्युनिस्ट देशों में तुरन्त समाप्त किया गया. अपनी सुविधाओं और वेतन में वृद्धि के लिए पूंजीवादी देशों में मज़दूरों का हड़ताल पर जाना एक आम बात है, लेकिन कम्युनिस्ट देशों में मज़दूर ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता. ''"
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शायद आपको पता होगा की  पूंजीवादी समाज में हड़ताल होने का मुख्या कारण होता है की बाजार में चीजो की माग के अनुसार अपना मुनाफा मेंटेन करने के लिए निजी मालिकाने वाले मिल मालिक उत्पादन को घटाते या बढाते रहते है ,,,और बाजार में दुसरे competition  जिसकी वजह से उन्हें मुनाफा ज्यादा से ज्यादा करने के लिए कभी कभी छटनी , मजदूरों से ओवर टाइम , और उनका शोषण करना होता है,,,,,,,,जिस वजह से मजदूर वर्ग हड़ताल और "बंद " जैसे रास्ते अपनाता है.
समाज वादी उत्पादन व्यवस्था में निजी मुनाफे को बढाने के लिए ऐसी कोई भी चीज नहीं होती और उत्पादन जनता की जरूरतों के हिसाब से होता है ..........इसीलिए हड़ताल की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

अधिकतर लोगो को शायद  ये जानकारी नहीं होती है की कम्युनिस्ट देशो में उत्पादन का तरीका क्या होता है और उत्पादन के साधनों (कारखानों, फार्म हाउस , खनिज और कोयले लोहे की खाने ..etc .) पर किसका अधिकार होता है ,
आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ की समाजवादी उत्पादन व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर जनता का हक़ होता है और कोई भी उत्पादन निजी मुनाफे के लिए नहीं होता है,,,,,,,,इसीलिए वहा पर उत्पादन व्यवस्था में मजदूरों का शोषण , कम मजदूरी, छटनी , जैसी कोई भी चीज नहीं होती और जनता को रोजगार देना और पूरी मजदूरी देना सरकार की जिम्मेदारी होती है, ..तो ऐसी व्यवस्था में "हड़ताल " की कोई संभावना नहीं रह जाती,,,क्योंकि मजदूर वर्ग को पता होता है की अगर उनकी नौकरी चली भी जाएगी तो भी उनका घर और जीवन चलाने के लिए उन्हें सरकार से भत्ता मिलता रहेगा ,,,जबकि पूंजीवाद में ऐसा नहीं होता है।
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4 - दिनेश त्रिपाठी जी आपने कहा  -- 
"जब अमेरिका ने मास्को में अमेरीकी मज़दूरों के जीवन पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया तो रूस के मजदूर आश्चर्यचकित रह गए ,जब उन्होंने देखा कि उनकी तुलना में अमेरिका के मज़दूरों को न केवल सुख-सुविधाएं ही अधिक हैं, उनका जीवन-स्तर भी ऊंचा है."****************************************************************
मुझे पता है की आपने ये पूरा लेख और "फिल्म" वाला प्रकरण "विपिन कुमार सिन्हा "के ब्लॉग से कोपी किया है , जो की प्रवक्ता. कॉम में लिखते रहे है....... ..बनिस्बत इसके की उन्हें मार्क्सवाद की कोई समझ ही नहीं है फिर भी वो भोली भली जनता को बरगलाने के लिए कई सालो से कम्युनिस्म के खिलाफ लिखते रहे है ,,,,,,इसमें कोई नयी बात नहीं है 
ऐसी कोई भी फिल्म कभी नहीं दिखाई गयी,,,और अगर दिखाई भी गयी होगी तो वो सिर्फ एक समाजवादी व्यवस्था को बदनाम और पूंजीवादी सिस्टम को कायम करने के लिए किया गया हथकंडा होता है .........क्योंकि 1950 से लेकर 1990 तक शीत युद्ध के दौरान रूस में बाहरी मीडिया के आने पर प्रतिबन्ध था और कोई भी अमेरिकी मीडिया कभी भी रूस में घुस ही नहीं पाया .
और रूस में मजदूरों की क्या स्तिथि थी इसे जानना हो तो आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलिए और बात करिए जिसने कभी 80 के दशक में रूस की यात्रा करी हो,,,,तो आपको पता चल जायेगा की साम्यवादी रूस जब अपने टूटने की कगार पर था तब भी वह के मजदूर दुनिया के बाकी मजदूरों से बेहतर हालात में थे .
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5 - दिनेश त्रिपाठी जी .... आपने कहा -
"आज भारत में कम्युनिस्ट का नया रूप माओवाद ने ले लिया, कम्युनिस्ट आज भी मार्क्स / एन्ग्लेस / लेनिन के विचारधारा को समझने में नाकाम..  
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"आज भारत में कम्युनिस्ट का नया रूप माओवाद ने ले लिया",,,,,,,,,ये आपने खुद लिखा है या कही से कोपी किया है ...मैं नहीं जानता ,,,,लेकिन जहा तक मैं समझ पा रहा हूँ आप शायद ये कहना  चाहते है की "आज भारत में कम्युनिस्म का रूप माओवाद ने ले लिया है",......
अगर ऐसा है तो आप बिलकुल सही कह रहे है ,,,,,,,,क्योंकि जिसे मार्क्सवाद की जरा भी समझ है वो ये जानता है की मार्क्सवाद एक सतत विकसित होते रहने वाला विज्ञान है ,,,,कार्ल मार्क्स ने अपने जीवन में सिर्फ पूंजीवाद तक ही बता पाए थे क्योंकि उनके जीवित् रहते तक  साम्र्ज्यावाद अपने शिशु अवथा में ही था,,,,20वी शताब्दी के शुरू होने तक साम्रज्यवाद ( Imperialism ) फैलना शुरू हो गया था,,,,,,,तब मार्क्स और अन्गेल्स की मृत्यु के बाद लेनिन ने मार्क्स वाद को  उसमे नए सिद्धांत जोड़े,,जिन्हें लेनिन वाद कहा गया , वो सिद्धांत थे (साम्राज्यवाद - पूंजीवाद की चरम अवस्था) Imperialism – A highest stage of Capitalism .

इस्सी प्रकार कामरेड माओत्सेतुंग ने साम्राज्यावादी सम्माज में लेनिनवाद को आगे बढाते हुए - जनयुद्ध और सांस्कृतिक क्रांति को चलाकर पूंजीवाद और नव-उपनिवेशवाद से लड़ने और साम्यवाद की तरफ बढ़ने के नए नियम दिए ....जिन्हें माओवाद कहा गया,
इस प्रकार "लेनिनवाद और माओवाद " का विचाराधार और अंतिम लक्ष्य वोही है जो मार्क्सवाद कहता है।,,,,,,,इसीलिए लेनिनवाद और माओवाद और कुछ नहीं बल्कि मार्क्सवाद का ही एक विकसित  रूप है,...........अगर कल आप इन सिद्धांतो में कुछ और सिद्ध्हंत जोड़ देते है तो वो भी "दिनेश त्रिपाठी-वाद" या मार्क्सवाद ही कहलायेगा।
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6 - दिनेश त्रिपाठी जी .... आपने कहा -
"वोह अपने बच्चे/पत्नी के साथ एक ही छत के नीचे रहते हैं...ओर कई कम्युनिस्ट मंदिर/गिरजाघर का चक्कर आये दिन सुबह शाम लगाते हैं.. आज देल्ही में शिला दीक्षित ने ६०० रूपए मासिक आय तय किया ५ जनों के परिवार के लिए. क्या कम्युनिस्ट कभी ६०० रूपए में गुजरा कर पायेगा ?? उनको कितना मासिक आय तय करना चाहिये ५ जनों के परिवारों के लिए ??? कहाँ गया कम्युनिस्ट भारत में ??? कहीं नज़र आये तो जरूर बताइयेगा , एक बार देखना चाहूँगा की वोह दिखने में कैसे होते हैं."
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भारत में मार्क्सवाद की खाल ओढ़े बैठे इन नकली कम्यूनिस्टो के बारे में आपकी ये बात बिलकुल सही है,,,,,,मैं भी आपकी इसस बात से सहमत हूँ।
लेकिन आज भी भारत में हजारो क्रांतिकारी साथी मार्क्सवाद,लेनिनवाद,माओवाद के विचारों को अपनाकर व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष कर रहे है,,,,,,,,,,अब ये आपके ऊपर निर्भर करता है की आप उन्हें पहचान पाते हो या नहीं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कामरेड विश्वनाथ के ब्लॉग द्वारा ज्ञात हुआ की उनके मित्र श्रीमान दिनेश त्रिपाठी जी ने कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में अपना ज्ञान बांटा हैं। त्रिपाठी जी ने जो कुछ भी सोविअत संघ/चीन/क्यूबा इत्यादि के बारे में लिखा हैं वह तथ्यहीन, कपोल-कल्पित लेखन का एक नमूना मात्र हैं। ऐसा तो कुछ भी लेख में नहीं हैं जिसपर ज्यादा कुछ लिखा जाये क्योंकि लेख दृष्टि से ही तथ्यपरक न होकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त एक अवैज्ञानिक दृष्टिकोण अधिक लगता हैं और एक विश्लेषणात्मक अध्ययन तो बिलकुल भी नहीं। उनके विचार वैसे ही जो कम्युनिस्ट विरोधी हमेशा से लिखते आयें हैं। अब में एक एक करके त्रिपाठी जी के कहे गए विचारों का खंडन करता हूँ।

    "जिस जिस देश में कम्युनिस्ट रहा और है उस देश के मजदुर वर्ग का जीवन बद से बत्तर होती चली गई.. रूस / चाइना/वेनेजुएला /भारत(बंगाल / केरल) किसी भी देश / राज्य में कम्युनिस्ट के साशन में सबसे जायदा शोषित वर्ग मजदुर ही रहा, "

    यहाँ पर ऐसा कुछ नहीं हैं जिससे पता चल सके की मजदूर वर्ग का जीवन किस प्रकार से बाद से बदतर हो गया? अक्टूबर क्रान्ति से पहले शताब्दियों से चली आ रही जार-शाही के ज़माने में रूस की स्थिति क्या थी? उसका कितना औद्योगीकरण हुआ था? वहां पर सर्वहारा समाज की क्या स्थिति थी? सामान्य शिक्षा और जनता के पास क्या स्वस्थ्य, सुख सुविधाएं उपलब्ध थी, इस पर त्रिपाठी जी ने कुछ नहीं लिखा हैं। शायद उन्हें मालूम भी न हो। अक्टूबर क्रान्ति के बाद न केवल औद्योगीकरण ने रफ़्तार पकड़ी, बल्कि महिलाओं की स्थिति, धार्मिक/नस्लीय/सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के भलाई के लिए सामाजिक सुधार कार्यक्रमों को चलाया गया। सोविअत संघ में 1950 तक साक्षरता आंकड़ा 90% को भी पार कर चुका था। ज़मींदारों से ज़मीन लेकर collective farming इकाइयां स्थापित की गयी, बैल और हल की जगह ट्रेक्टर इत्यादि प्रदान किये गए, शहरी औद्योगिक इकाइयों में मजदूरों कार्य सम्बन्धी वातावरण में कई सुधार किये गए, उन्हें उचित वेतन, स्वस्थ्य एवं बीमा की सुविधाएं प्रदान की गयी, वार्षिक छुट्टियों का भी प्रावधान किया गया। महिलाओं को मत का अधिकार मिला, उन्हें भी घर से बाहर काम करने का अवसर मिला। अगर मजदूर वर्ग शोषित होता तो क्यों नहीं इस वर्ग ने कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ द्वितिटी विश्व युद्ध में अपनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल? उलटे ही सर्वहारा वर्ग ने, द्वितीय विश्व युद्ध की सब से बड़ी शक्ति, नाज़ी जर्मनी की शक्ति को खंडित किया और पूरे विश्व को नाज़ी वाद की नस्लीय विचारधारा और फासीवादी विचारधारा से बचाया।

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  2. पश्चिम बंगाल में 1977 में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद वहां पर "बर्गा" भूमि सुधार आन्दोलन चलाया गया जिसके तहत भूमिहीन मजदूरों और कृषकों को, भूमियाँ प्रदान की गयी, यह सोचने की बात हैं की भारत में ऐसा कोई एक उद्दहरण हैं जहाँ सर्कार ने ऐसे व्यापक आन्दोलन चलाये हो और भूमिहीनों को भूमि प्रदान करी हो? केरला में शिक्षा का स्तर और स्वास्थीय सेवाएं पूरी देश में कहीं ज्यादा उतीर्ण हैं। यहाँ सही हैं की कुछ कमियां ज़रूर रही पर इसका मतलब यहं नहीं की यह एक असफल विचारधारा हैं। यह तो मनाव सभ्यता का भविष्य हैं जहाँ मनाव को जाना ही हैं।

    "किसी भी कम्युनिस्ट नेता ने उनके हालात को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया.. नतीजन पूंजीवाद का पलायन या कम्युनिस्ट विचारधारा को त्याग कर पूंजीवाद के शरण में जाना..आज रूस/चाइना एक पूंजीवाद देश के रूप में उभर रहे हैं.. यह वोही देश हैं जहां लेनिन / माओ के विचार ने देश के अधिकांश लोगो को शोषित होने पर मजबूर कर दिया।"

    सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस का साम्यवाद से को लेना देना नहीं रहा। भ्रष्ट पोलित ब्यूरो के सदस्य और सरकारी उपक्रमों के बड़े अधिकारियों ने सोवियत संघ के विघटन के बाद औद्योगिक इकाई हथिया ली और उनके मालिक बन बैठे। चीन भी लगभग उसी राह पर हैं जा रहा हैं, फर्क सिर्फ इतना हैं की चीनी अभी भी साम्यवाद के परचम तले हैं लेकिन आज के रूस और चीन का साम्यवाद/समाजवाद से कोई नाता नहीं हैं।

    "पूंजीवादी देशों मे मज़दूरों को संगठन बनाने और हड़ताल का अस्त्र प्राप्त था और है भी.मज़दूरों का यह अधिकार कम्युनिस्ट देशों में तुरन्त समाप्त किया गया. अपनी सुविधाओं औ
    र वेतन में वृद्धि के लिए पूंजीवादी देशों में मज़दूरों का हड़ताल पर जाना एक आम बात है, लेकिन कम्युनिस्ट देशों में मज़दूर ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता.जब अमेरिका ने मास्को में अमेरीकी मज़दूरों के जीवन पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया तो रूस के मजदूर आश्चर्यचकित रह गए ,जब उन्होंने देखा कि उनकी तुलना में अमेरिका के मज़दूरों को न केवल सुख-सुविधाएं ही अधिक हैं, उनका जीवन-स्तर भी ऊंचा है ."

    उपरोक्त कथन जितना हास्यपद हैं, उतना ही मूर्खतापूर्ण हैं जो लेखक की अज्ञानता को दर्शाता हैं। 1920 से जहाँ सोविअत रूस में औद्योगीकरण, राष्ट्रीय साक्षरता अभियान, मजदूर एवं औद्योगिक इकाई के कर्मियों के लिए सुधार कानून और उन्हें सुविधायें दी जा रही थी, वहीँ पाश्च्यत देशों में विशेषकर अमरीका में बल मजदूरी चरम पर थी और अश्वेतों को सरेआम खुले में फांसी दी जाती थी। पाश्यात देशों में मजदूर वर्ग के लिए सुविधायें, उनके अधिकार और हकों की बात द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी "रेड आर्मी" और सोवियत संघ के प्रभाव से बचाने के लिए इन देशों में लाये गए, वरना सोवियत संघ के तर्ज पर इन देशों में भी श्रमिक क्रान्ति ज़रूर होती। और यह अमेरिका द्वारा मास्को में अमेरिकी मजदूरों के बारे में फिल्म दिखाए जाना एक सफ़ेद झूठ से अधिक कुछ भी नहीं। ये कौन सी फिल्म थी, इसको किसने बनाया कोई जानकारी इस सम्बन्ध में लेखक ने नहीं दी। आज पाश्च्यात देशों में श्रमिक वर्ग के वहीँ अधिकार धीरे धीरे ख़त्म किये जा रहे हैं। उनको उचित वेतन नहीं दिया जा रहा हैं, उनके कार्यों को उन देशों में स्थानांतरित किया जा रहा हैं जहाँ श्रम का मूल्य सस्ता हैं। नियमित वेतन के श्रमिकों को हटा कर, अनियमित/ठेके पर काम कराया जा रहा हैं क्योंकि नियमित श्रमिक को वेतन, न्यूनतम वेतन, स्वस्थ्य सम्बन्धी सेवा, अवकाश दिए जाते हैं कानूनन पर इन खर्चों से बचने के लिए अब निजी क्षेत्र नियमित श्रमिकों के बजाये अनियमित/ठेके पर रखे जाने वाले श्रमिकों से काम करा रहा हैं, जिनके लिए न तो कोई वैतनिक अवकाश देना ज़रूरी हैं, न स्वस्थ्य सम्बन्धी सेवा उपलब्ध करने की बंदिश और न ही न्यूनतम वेतन देने का कोई कानूनी बाध्य्ता।

    आप कम्युनिस्ट हो कर भगवान् अल्लाह में विश्वास रख सकते हैं, बशर्ते आप उसे अपने निजी स्तर पर रखे। मार्क्स ने धर्म को अफीम बोल हैं क्योंकि शासक वर्ग ने पुरोहित वर्ग के साथ मिलकर आम जनता को भगवान् का डर दिखा कर उनपर अनगिनत अत्याचार किया और कहा गया यह सब भगवान् की मर्ज़ी हैं। और इन्ही दो वर्गों ने पूंजीवाद के आने तक भरसक शोषण किया।

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    1. यदि कम्युनिस्ट विचारधारा इतनी ही सुनियोजित, सुगठित और प्रगतिशील है तो क्या कारण है कि दशकों पुराने कम्युनिस्ट शासित राष्ट्र टूट गये/रहें है। यदि वहाँ की जनता हर प्रकार से खुश/प्रगतिशील और प्रसन्न है तो कोई कारण समझ में नहीं आता????

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