मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

फिल्म समीक्षा - चक्रव्यूह

कामरेड ..........पिछले साठ साल से इ सरकार हमको धोखा देत है ........


मार्क्सवाद के अनुसार जब तक उत्पादन के साध्नो पर मुठ्ठी भर लोगो का कब्जा रहेगा तब तक शोषण मुक्त समाज कि कल्पना करना बेमानी है  ...लेकीन पून्जीवादी  विद्वान ओर मीडिया इसे सही ठेहरता है ,,,,उनके अनुसार पुंजीपती ही विकास कर सकते ही जिससे उनके मुनाफे से बची पुंजी रिस रिस कर नीचे जनता तक पहुचेगी ओर जनता का विकास होगा .......जबकी हकीकत मे विकास का मतलब संसाधानो का राष्ट्रीयकरण करके उनका विकास जनता के लिये करना होता है , न कि मुनाफा कामाने के लिये. विकास के लिये देश के संसाधानो को बडे बिजनेस घरानो ओर विदेशी कम्पनियो को बेचने से सिर्फ शोषण ही बढता है , लेकिन जनता का विकास नही होता. लोगो को इस भ्रम जाल को समझना पडेगा कि आधौगिक विकास सरकार खुद भी कर सक्ती ही ...बशर्ते  कि सरकार की नियत मे खोट न हो .
इन्ही विरोधो ओर झन्झावतो से पनपे नक्सलवाद संघर्ष पर आधारित है  प्रकाश झा कि फिल्म "चक्रव्यूह"
फिल्म पर चर्चा करने से पहले थोडा उसकी कहानी ओर पात्रो पर एक नजर डाल लेते है.
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आदिल (अर्जुन) ओर कबीर (अभय) दोनो पुलिस अकादमी  मे साथ साथ ट्रेनिंग लेते है लेकीन अपने अतिवादी स्वभाव के कारण अभय ट्रेनिंग छोड कर चला जाता है ,,बाद मे दोनो की  मुलाकात तब होती है जब अर्जुन मध्य प्रदेश के एक नक्सली इलाके नंदिघाट मे पोस्टेड होता है . अभय उसकी हेल्प के लिये छदम तरीके से नक्सलियों  के दल मे भरती हो जाता है और  उसके लिये मुखबरी शुरू कर देता है , इधर राज्य सरकार आधौगिक ग्रुप महानता को फायदा पाहुचाने के लिये आदिवासियो कि जमीन कब्जना चाहती है ओर अर्जुन को सरकार के दवाब में महानता ग्रुप के फायदे के लिये आदिवासियो के विरोध का दमन करना पडता है ...... इधर अभय देओल नक्सलियों के  साथ रहते हुये आदिवासियो के लिये काम करते हुये विचारधारा के प्रभाव मे अन्ततोगोत्वा  नक्सल बन जाता है   ........ओर महानता ग्रुप  और सरकार कि नितियो के खिलाफ आदिवासियों का साथ देते हुये अर्जुन के सामने आ जाता है. अंत में  खुनी संघर्ष मे  अभय एक नक्सली के रूप आदिवासियों के हक़ की लड़ाई लड़ते हुए शहीद हो जाता है।

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फिल्म मे  लगभग सभी किरदार,और घटनाये असल मे 1970 से 2012  तक के नक्सली मुवमेंट से लिये गये है ,
फिल्म मे  ओम पुरी कोबाड घांडी बने है , तो मनोज बाजपेयी ने किशन जी के चरित्र को छुंआ है,,,अभय देओल  को  कामरेड आजाद (चेरी राजकुमार - आजाद) बनाया गया है.ओर अर्जुन रामपाल को के.विजय.कुमार का किरदार दिया गया है. (ये वोही IPS विजय है  जीन्होने वीरप्पन को मारा था ओर आजकल इन्हे नक्सलीयो  के खिलाफ पोस्ट किया गया है)
ओर आखिर मे वेदान्ता ग्रुप को महानता ग्रुप के नाम से दिखाया  है।
आप यु ट्यूब में कोबाड घांडी के असली विडियो को देख सकते है जिसमे पुलिस कस्टडी में भगत सिंह जिंदाबाद के नारे लगाते हुए जा रहे है,,,फिल्म में ये द्रश्य हुबहू दिखाया गया है .
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फिल्म का प्लॉट यकीनन ॠषी केश मुखर्जी कि "नमक हराम" फिल्म से लिया गया है , लेकीन अब भी प्रकश झा वर्ग चरित्र ओर वर्ग संघर्ष के उस बिंदू तक नही पहुच पाये जहा पर ॠषी केश मुखर्जी पहुचे थे...........नमक हराम मे जहा राजेश खन्ना और अमिताभ तमाम सम्वेद्नाओ  के वावजूद अपने वर्ग चरित्र से चिपक कर मार्क्सवाद को सही सिद्ध करते दिखाई देते है , वही चक्रव्यूह मे अभय और अर्जुन एक ही वर्ग से आने  के वावजूद मात्र अपने स्वभाव के कारण अपने रस्ते चुनते है ..जो कि थोडा मुम्बईया टाईप लगता है

लेकीन आज के समय को देखते हुये मै प्रकश झा को कोई दोष  नही देना चाहुंगा,,,शायद व्यावसायिक मजबुरियो के कारण फिल्म का ऐसा प्लॉट रखना जरुरी था .रही बात फिल्म कि कहानी  कि ओर उसके संदेश कि......तो प्रकाश झा उसे जनता तक पहुचाने मे  प्रकाश कामयाब रहे है. प्रकाश ने बेहतरीन तरीके से दिखाया ही कि किस  तऱ्ह प्रशाषन, सरकार और  राज्य सरकार पून्जीपतियो के आगे नतमस्तक हो जाती है ...ओर उनके उधोगो और मुनाफे को बढाने के लिये देश ओर राज्यो के जल जंगल ओर जमीन कि लूट के लिये सारे नियम कानून ताक पर रख कर बिनावजह जनता के दमन पर उतर आती है ........ओर कोई विरोध करे तो फिर हिंसा - अहिंसा का पाठ जपने लगती है .....ओर विरोध करने  वालो को आतंकवादी तक करार दे देती है
फिल्म समाज में  फैले  विरोधाभास को भी दिखाती है कि  - आम आदमी विरोध करे तो वो हिंसा ओर अगर येही काम सरकार करे तो कानून,,,,,इस अंतर्द्वंद को मेडिया कैसे प्रस्तुत  करता है  ,,,ओर कैसे पढे लिखे लोग भी इस मुगालते मे जीते है,,,,,इसे दिखाने के लिये प्रकाश झा ने फिल्म मे अर्जुन रामपाल के किरदार का सहारा लिया है.  अर्जुन की प्रक्टिस और सोच के माध्यम से वो ये दिखाने मे कामयाब रहे है .....जो कि वो एक पोलीस ऑफिसर होने के बाद भी राज्य के द्वारा कि गयी हिंसा, दमन और वर्ग संघर्ष के लिये कि गयी हिंसा के बीच के अंतर को नही समझ पाता और जनता के दमन को देश भक्ती समझता है ,, और आदिवासियो कि लडाई को देशद्रोह.
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2010 में दांतेवाडा में CRPF - नक्सली संघर्ष में 75 जवानो की मौत के बाद सरकार के इशारे पर मीडिया ने नक्सलियों को आतंकवादी कहकर बदनाम करना  शुरु कर दिया ,,लेकिन मीडिया ने ये नहीं बताया की CRPF वाले लोग जंगल में नक्सलियों के साथ बीयर पार्टी करने नहीं बल्कि उन्हें मारने ही गए थे , और नक्सलियों के द्वारा किया गया हमला उसी का प्रतिकार था। मीडिया ने ये भी नहीं दिखाया की उस घटना के बाद लगभग 1000 से ज्यादा मासूम और निर्दोष आदिवासी गाँव वालो को पुलिस ने घरो से निकाल निकाल कर मारा था।
चक्रव्यूह फिल्म  इस घटना को भी ठीक से दिखाने में कामयाब रही है,,,लेकिन आपको इसे ध्यान से देखना पड़ेगा की इन दोनों हिंसात्मक कार्यवाहियों में असल गलती किसकी थी,,,,,,जिसे फिल्म में अभय देओल बताते है।
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प्रकाश झा अपनी व्यावसायिक मजबूरीयो के चलते इसे सिर्फ एक फिल्म के रूप में ही प्रचारित कर सकते है.....वो चाह कर भी ये नही बतला सकते कि असल में नक्सल समस्या सरकार की ही देन है....ये आपको फिल्म देख कर खुद समझना पडेगा....देश के वो लोग जिन्हे सरकार ने आजादी के बाद कभी पूछा तक नही ...वो हमेशा जंगलो के भरोसे अपनी जिंदगी चलाते रहे,,,जिस जंगलो  ने हजारो सालो तक इन आदिवासियो को पाला और अब सरकार इन्ही जंगल ,पहाडो ओर नदियो को बेच कर इन्हे प्रायवेट प्रोपर्टी बना कर इनमें आदिवासियो के घुसने तक पर प्रतिबंध लगा देना चाहती है। फिल्म मी राजनेताओं द्वारा आदिवासियो को येही संदेश देते हुये दिखाया गाय ही कि आप महानता ग्रुप का विरोध न करे,,,,ओर जब इससे भी काम नही बनता  तो महानता ग्रुप के मालिक का बेटा आदिवासि इलाको के दबंगो के द्वारा बनाई गायी प्रायवेट सेना को बल प्रयोग करके  जंगल खाली करने को कहता है .इसी के विरोध स्वरूप  नक्सली लोगो को एकजूट करके उन्हे सरकार के खिलाफ हथियार बंध होने  के लिये तैय्यार करते है।

प्रकश झा ने नक्सल वाद की सिद्धान्तिक गहराहियों में न उतर कर सिर्फ वर्तमान घटनाओं को लेकर फिल्म बनायी है ,,,जो की सही भी है,,,वरना ये फिल्म एक डाक्यूमेंट्री बन जाती, जो की एक आम आदमी की समझ से बाहर होती। अब ये हमारी जिम्मेदारी बनती है  कि फिल्म को हम किस नजरीये से देखे,,,,,अगर आप इस पूर्वग्रह से फिल्म देखने  जायेंगे कि नक्सली सिर्फ हिंसा करते ही तो बेहतर ही कि आप अपने पुर्वाभास में  ही  रहे ओर फिल्म देखने ना जाये.....,,,और  अगर आप ये समझाना चाहते ही कि नक्सली समस्या क्या है ,,,ओर कितनी प्रासंगिक ही ,,तो फिल्म जरूर देखे,,
फिल्म के द्वारा ये सन्देश सिया गया है की  नक्सलवाद का मतलब जंगल में बम पटाखे फोड़ना नहीं है  , नक्सलवाद का मतलब सिर्फ हिंसा नही है ........... ...नक्सलवाद का मतलब "हक के लिये लडाई है "...और हिंसा सिर्फ इस लडाई का प्रतिफळ है जिसके लिये नक्सलियों से ज्यादा सरकार जिम्मेदार है.
फिल्म अंत में इस संदेश के साथ ख़तम होती है कि,,,सदियो से दबे कुचले लोग दया कि भीख मांगने कि बजाय अपना हक छीनने के लिये हथियार भी उठा सकते है ,,,,इसी शोषण और जनता के एक बड़े हिस्से की अनदेखी  की वजह से भारत में एक अघोषित ग्रह युद्ध चल रहा है , जिससे भारत माता कि धरती खुद अपने हि बच्चो के खून से हर रोज लाल होती है ...ओर ये लडाई तक तक चलेगी जब तक इन्सान का इन्सान के द्वारा शोषण का ये "चक्रव्यूह" ख़तम नही हो जाता .

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